नेता बदले, सत्ता बदली लेकिन नहीं बदली व्यवस्थाएं
लेख
13-Aug-26
लेखक: अनिल ताम्रकार
एक आंदोलन सड़ा-गला, भ्रष्ट सिस्टम को सुधारने के लिए भी होना चाहिए

हमारी विचारधारा भले ही किसी राजनैतिक दल से मेल खाती हो...लेकिन हमारी निष्ठा किसी दल या नेता नहीं...बल्कि देश और देश की जनता के हित में होनी चाहिए....आजादी के बाद लगभग 79 वर्षों में सत्ता तो कई बार बदली....विकास भी हुआ....लेकिन सत्ता का चरित्र नहीं बदला...सिस्टम नहीं बदला....हमने भी कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया...बल्कि हम भ्रष्ट सिस्टम को स्वीकार करते चले गए और इसकी जड़ों को सींचते भी रहे....भ्रष्टाचार अब हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग बन चुका है.....परिणामस्वरुप अब स्थिति बद से बदतर हो गई......चुनाव दर चुनाव होते हैं....लेकिन नागनाथ की जगह सांपनाथ आ जाते हैं....शुरुआत राजनीति के अपराधीकरण से हुई...लेकिन अब अपराधियों का राजनीतिकरण हो चुका है....संसद से लेकर विधानसभाओं तक अपराधिक तत्वों की घुसपैठ हो चुकी है...और इसके लिए निस्संदेह जनता दोषी और जिम्मेदार है....!
देश में पहले भी कई आंदोलन हुए...लेकिन वे सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित रहे....व्यवस्था परिवर्तन नहीं हो सका....यह सभी आंदोलनों की विफलता ही कही जाएगी....इन आंदोलनों से निकले नेताओं ने भी भ्रष्टाचार के कई रिकार्ड तोड़ दिए...!
आंदोलन जब तक व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं होंगे...तब तक कुछ भी बदलने वाला नहीं है....इसके लिए सबसे पहले जनता को अपना चरित्र बदलना होगा...!
देश में सत्ता किसी की भी हो...भविष्य में यदि सत्ता परिवर्तन होता भी है....तो नई सरकार से हमारी निम्न अपेक्षाएँ होनी चाहिए....
सबसे पहले राजनीति के अपराधीकरण को पूर्णतः खत्म करने हेतु ठोस कदम उठाने चाहिए...ताकि संसद और विधानसभाएँ अपराधियों से पूर्णतः मुक्त हों....इसके लिए जरूरी हुआ तो जनमत संग्रह भी करवाया जा सकता है....देश को भ्रष्टाचार से पूर्णतः मुक्त करने हेतु ठोस कदम उठाने चाहिए...भ्रष्टाचार का गंदा नाला सदैव ऊपर से नीचे की ओर बहता है...इसके लिए ऐसा लोकपाल बिल लाना चाहिए जिससे कोई भी भ्रष्टाचारी नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री न बच पाए....आरोप साबित होने पर आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए तथा चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए और भ्रष्टाचार से कमाई हुई सारी संपत्ति को जप्त कर देश के शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार व विकास के काम में लाना चाहिए...यदि कोई अधिकारी,कर्मचारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा जाए तो उसे निलंबित नहीं...सीधे बर्खास्त करना चाहिए और सारी अवैध संपत्ति जब्त करना चाहिए....और आरक्षण से जिनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ हो चुकी है....उन्हें इसका लाभ नहीं देना चाहिए....बल्कि इससे भी उत्तम तो यह होगा कि इस वर्ग के संपन्न लोग खुद ही स्वेच्छा से जरूरतमंदों के हित में इस सुविधा का त्याग कर दें.....अभी भी आरक्षित वर्ग में कई लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है...उनको ही इसका लाभ दिया जाना चाहिए...साथ ही अनारक्षित वर्ग के गरीबों को भी इसके दायरे में लाना चाहिए.....भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिए....सभी के साथ इंसाफ होना चाहिए...चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो....इसी तरह देेशहित के खिलाफ काम करने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.....बगैर किसी जातीय/ सांप्रदायिक/राजनैतिक भेदभाव के.....! सवाल सिर्फ सत्ता बदलने का नहीं है..वह तो कई बार बदल चुकी है...लेकिन व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं हुआ...बल्कि वह बद से बदतर हो गई....जब तक यह सड़ा-गला भ्रष्ट सिस्टम नहीं सुधरेगा...तब तक लोकतंत्र के कोई मायने नहीं हैं.....सारी समस्याओं की जड़ यही है...प्रहार इस पर होना चाहिए....!!