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ढैंचा हरी खाद से खेतों की मिट्टी हो रही और ज्यादा उपजाऊ

ढैंचा हरी खाद से खेतों की मिट्टी हो रही और ज्यादा उपजाऊ
कृषि जगत
17-Aug-26
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे जिले के किसान

कम लागत में खेतों की मिट्टी के स्वास्थ्य सुधार की दिशा में बढ़ा कदम

छिन्दवाडा 

“मिट्टी स्वस्थ होगी, तो खेती समृद्ध होगी और किसान खुशहाल होगा।”  इसी सोच को आत्मसात करते हुए जिले के विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम कामठी के किसान अब प्राकृतिक खेती की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत चयनित कामठी क्लस्टर में किसानों द्वारा ढैंचा की बुवाई कर उसे हरी खाद के रूप में खेतों में अपनाया जा रहा है। किसानों की यह पहल न केवल मिट्टी की सेहत सुधार रही है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और कम लागत में टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास है।

खेत में उगी हरी खाद, मिट्टी के लिए बनी प्राकृतिक संजीवनी

कामठी क्लस्टर के 9 कृषकों ने अपने खेतों में ढैंचा की बुवाई की। फसल की पर्याप्त वृद्धि होने के बाद किसानों ने ढैंचा को खेत में ही जुताई कर मिट्टी में मिला दिया। इससे हरा जैवभार खेत की मिट्टी में वापस पहुंचा और जैविक पदार्थ तथा पोषक तत्वों के प्राकृतिक पुनर्चक्रण में सहायता मिली। ढैंचा को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने के साथ-साथ मृदा संरचना, जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार होता है। इस प्रकार खेत में तैयार हुई हरी खाद अगली फसल के लिए मिट्टी को प्राकृतिक रूप से तैयार करने का काम करती है।

नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भी सहायक

ढैंचा एक दलहनी फसल है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायक होते हैं। यही कारण है कि ढैंचा को हरी खाद के रूप में अपनाना मृदा स्वास्थ्य सुधार की दृष्टि से उपयोगी माना जाता है। ढैंचा को खेत में मिलाने के बाद मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव इसके जैविक अवशेषों को विघटित कर पोषक तत्वों को आगामी फसल के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता मिलती है और खेती में स्थानीय एवं प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है।

आलू की फसल से पहले हरी खाद की ओर बढ़ रहा रुझान

छिंदवाड़ा जिले में भी किसान धीरे-धीरे ढैंचा और सनई को हरी खाद के रूप में अपनाने लगे हैं। कई किसान मुख्य फसल से पहले इन फसलों की बुवाई कर उन्हें खेत में ही मिला देते हैं। विशेष रूप से आलू की फसल लगाने से पूर्व ढैंचा एवं सनई को खेत में लगाने और बाद में मिट्टी में मिलाने की परंपरा किसानों के बीच बढ़ रही है। इससे खेत में जैविक पदार्थ की उपलब्धता बढ़ती है और मिट्टी को अगली फसल के लिए बेहतर स्थिति में तैयार करने में सहायता मिलती है। कम लागत में खेत की उर्वरता सुधारने की यह तकनीक किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन रही है।

कम लागत, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और स्वस्थ मिट्टी

हरी खाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए किसान अपने ही खेत में जैविक पदार्थ तैयार कर सकते हैं। इससे बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। ढैंचा जैसी फसलों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।       

किसानों की यह पहल इस संदेश को भी मजबूत करती है कि खेती में प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक बेहतर रखा जा सकताहै। अन्य किसानों के लिए बन रही प्रेरणा-कामठी क्लस्टर के किसानों द्वारा अपनाई गई यह पहल अब आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रही है। खेत में ही तैयार होने वाली हरी खाद के माध्यम से मिट्टी को पोषण देने का यह प्रयास कम लागत, स्वस्थ मिट्टी और टिकाऊ कृषि की दिशा में अनुकरणीय कदम है।मिट्टी में लौटी हरियाली,खेती में लाई खुशहाली। प्रकृति से जुड़ी खेती अपनाएं,मिट्टी को स्वस्थ और समृद्ध बनाएं।

इन किसानों ने अपनाई ढैंचा की हरी खाद

कामठी क्लस्टर के कृषक रामप्रसाद कड़वे, किशोर डिगरसे, राजेश राऊत, जीतेन्द्र राऊत, श्रीमती अनीता घागरे, श्रीमती कला डिगरसे, श्रीमती मधु फरकारे, रघुवर भादे एवं टांटी डिगरसे द्वारा अपने खेतों में ढैंचा की बुवाई कर हरी खाद की तकनीक को अपनाया गया है। इन किसानों का यह प्रयास मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के साथ-साथ प्राकृतिक खेती की ओर जिले में बढ़ते कदमों का उदाहरण है। स्वस्थ मिट्टी से स्वस्थ फसल और स्वस्थ फसल से समृद्ध किसान की दिशा में कामठी क्लस्टर की यह पहल निश्चित रूप से अन्य किसानों को भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।
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