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मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर देश में सबसे ज्यादा: 1,000 में 48 नवजातों की मौत, सीएम मोहन यादव ने जताई गहरी चिंता

मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर देश में सबसे ज्यादा: 1,000 में 48 नवजातों की मौत, सीएम मोहन यादव ने जताई गहरी चिंता
मध्यप्रदेश
29-Jun-25
भोपाल
प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। भारत में सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर (IMR) वाला राज्य बनने के बाद अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुद इस पर चिंता जताते हुए इसे लेकर ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।


गुरुवार रात कमिश्नर-कलेक्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री ने मातृ और शिशु मृत्यु दर पर गहरी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि इतने बड़े बजट और योजनाओं के बाद भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। बता दें कि प्रदेश में स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग को हाल ही में एकीकृत किया गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद की जा रही है। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर तस्वीर अब भी चिंताजनक बनी हुई है।

हर 1,000 बच्चों में 48 की मौत

नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) बुलेटिन के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 1,000 जीवित जन्मों में से 48 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है। वहीं जन्म के 28 दिन के भीतर होने वाली नवजात मृत्यु दर (NNMR) भी प्रदेश में सबसे ज्यादा 31 प्रति हजार है, जबकि राष्ट्रीय औसत 20 है।

सिर्फ 120 अस्पतालों में ही सीजेरियन की सुविधा

प्रदेश के कुल 547 अस्पतालों में सीजेरियन डिलीवरी की सुविधा होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह सेवा केवल 120 अस्पतालों तक ही सीमित है। स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को मिलाकर 177 अस्पतालों को सीजेरियन सुविधा के लिए चिन्हित किया है, लेकिन इनमें भी कई अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण यह सुविधा 24 घंटे उपलब्ध नहीं है।

सीजेरियन डिलीवरी के लिए तीन विशेषज्ञ – शिशु रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ का होना अनिवार्य है। इन तीनों विशेषज्ञों की अनुपलब्धता के कारण इस सेवा का विस्तार नहीं हो पा रहा है।

कई जिलों में बेहद सीमित सुविधाएं

सिंगरौली जैसे जिलों में केवल जिला अस्पताल में ही सीजेरियन सुविधा उपलब्ध है। वहीं आलीराजपुर, अशोकनगर, बुरहानपुर, दतिया, डिंडौरी, उमरिया, हरदा और श्योपुर जैसे जिलों में यह सुविधा केवल दो-दो अस्पतालों में सीमित है। जबकि प्रदेश में 52 जिला अस्पताल, 161 सिविल अस्पताल और 348 सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) हैं।

बजट 10 हजार करोड़ से ज्यादा, फिर भी हालात चिंताजनक

राज्य सरकार हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है। इसके बावजूद, विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी और संसाधनों के सीमित उपयोग के चलते प्रदेश की मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाएं लगातार सवालों के घेरे में हैं।

मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि चिन्हित अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती तत्काल सुनिश्चित की जाए और प्रसव के लिए जरूरी सभी सुविधाएं प्राथमिकता से उपलब्ध कराई जाएं। उन्होंने मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए सख्त रणनीति तैयार करने पर जोर दिया है।
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