रसायनिक खाद को लेकर पूर्व सांसद नकुलनाथ ने सरकार को घेरा
राजनीति
17-Jun-26
सरकार ने खाद लेने के लिए नियम और कानून सिर्फ किसानों के लिए बनाए: नकुलनाथ
छिन्दवाड़ा
खरीफ सीजन के लिए किसानों ने खेत तैयार कर लिए है और अच्छी बारिश के बाद बीज बोने की तैयारी में है। इसके साथ ही फसल के शुरूआती दिनों में लगने वाली रसायनिक खाद को लेकर चिंतित किसानों को अब पूर्व सांसद नकुलनाथ का साथ मिल गया है। पूर्व सांसद नकुलनाथ ने किसानों की चिंताओं का समर्थन करते हुए बयान जारी किया है।
उन्होंने कहा किसानों का हक मारा जा रहा है और जिम्मेदार सोए हुए हैं। कालाबाजारी से एक कदम बढ़कर अब गोदामों से ही खाद गायब हो रहा है तो कहीं नियम विरुद्ध जाकर खाद बेच दी जा रही और किसान भाइयों को खाद के लिए नियमों का हवाला दिया जा रहा। कई कृषक ऐसे भी है जो ठेके पर भूमि लेकर खेती किसानी करते हैं, उनके लिए नियम पेचिदा साबित हो रहे। वहीं खाद का दूसरा पहलू यह भी है कि गोदाम से ही गायब हो रहा। ऐसे में प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिर खाद गायब होने के बाद कहां जा रही।
श्री नाथ ने कहा कि नगद राशि लेकर भटकते किसान भाइयों को उचित मूल्य की दुकानों से खाद नहीं मिल रही। वे खुले बाजार में लुट रहे हैं, क्योंकि जिम्मेदारों का लालच इतना बड़ा हो चुका है कि वे अब किसान भाइयों के हक की खाद भी नियमों के खिलाफ जाकर बेच रहे। हाल ही में सरकार ने खाद के मूल्यों में प्रति बोरी 175 रुपए से लेकर 550 रुपए तक की वृद्धि का बोझ भी डाला है। पोटाश के दाम प्रति बैग 1800 से बढ़कर अब 1975 रुपए, पोटाश में सीधे 75 रुपए की मूल्य वृद्धि एनपीके के दाम 1900 रुपए से बढ़कर 2450 रुपए तक पहुंच गए हैं।
निश्चित तौर पर गोदामों से गायब हुए खाद पर मुनाफाखोरी की जा रही होगी, क्योंकि लाखों रुपए के खाद का गायब होना कोई सामान्य घटना नहीं है। इतने गम्भीर और संवेदनशील मामले में कार्रवाई नहीं होना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है। छिन्दवाड़ा और पांढुर्ना जिले का किसान खाद के लिए भटक रहा, कतार में खड़ा हो रहा और नियमों का पालन भी कर रहा फिर भी उसे पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल रही, इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा का भ्रष्टाचार में गले तक डूबा हुआ वह तंत्र हैं जिसका दंश सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि पूरा समाज झेल रहा है। छिन्दवाड़ा जिला मुख्यालय के बाद मेघदौन और चांद की समितियों से लाखों रुपयों की खाद गायब होना और नियम विरुद्ध बेचा जाना संगठित समूह के द्वारा किया जाना प्रतीत होता है और यह पता नहीं चलना की आखिर खाद गई कहां ? यह बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रही है।