जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं में लगी आग कब बुझेगी ?
लेख
22-Aug-26
वॉर्मर में लगी आग ने सिर्फ तीन नवजातों को नहीं झुलसाया, व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए
समीक्षक: राम कुमार विश्वकर्मा
छिंदवाड़ा
जिला अस्पताल के SNCU नवजातों को गर्म रखने वाली वॉर्मर मशीन में आग लगना महज एक तकनीकी दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाने वाला मामला नहीं है। तीन मासूम बच्चों का झुलसना और उनमें से एक की इलाज के दौरान मौत हो जाना उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसका सबसे पहला दायित्व ही नवजातों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई कोई सामान्य वार्ड नहीं होता। यहां ऐसे बच्चे रखे जाते हैं, जिन्हें जन्म के बाद अतिरिक्त निगरानी और विशेष देखभाल की जरूरत होती है। उनकी जिंदगी कई बार मशीनों, मॉनिटर और प्रशिक्षित स्टाफ पर निर्भर होती है। ऐसे में जिस वॉर्मर मशीन का काम बच्चे को जीवनदायी गर्माहट देना है, उसी से आग लग जाना बेहद गंभीर विषय है। प्रारंभिक जानकारी में कहीं शॉर्ट सर्किट तो कहीं हीटिंग यूनिट के फिलामेंट में स्पार्किंग की बात सामने आ रही है। तकनीकी जांच के बाद वास्तविक कारण सामने आएगा, लेकिन इससे पहले कुछ बुनियादी सवालों के जवाब जरूरी हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न, क्यों नहीं हुई मशीनी उपकरणों की नियमित जांच?
क्या मशीन की नियमित सर्विसिंग और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी जांच होती थी? क्या सभी वॉर्मर और विद्युत उपकरणों का समय-समय पर निरीक्षण किया जाता है? क्या SNCU में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे? और सबसे महत्वपूर्ण] अगर मशीन में आग लगी तो उसे तुरंत रोकने और बच्चों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि एक ही डोली में तीन नवजात क्यों रखे गए थे और उस समय वार्ड की निगरानी व्यवस्था कैसी थी। इन सवालों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस खामी को सामने लाना है, जिसे दूर करके भविष्य में किसी दूसरे परिवार को ऐसी त्रासदी से बचाया जा सके।
एक मौत को आंकड़ा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता
जबलपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान एक नवजात की मौत ने इस घटना को और गंभीर बना दिया है। वह बच्चा किसी परिवार की उम्मीद था। उसके माता-पिता के लिए यह सिर्फ अस्पताल की एक घटना नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द है। अस्पताल प्रबंधन द्वारा बच्चों को तत्काल जबलपुर रेफर करना और प्राथमिक उपचार देना अपनी जगह जरूरी कदम था, लेकिन सवाल घटना के बाद की कार्रवाई से आगे का है। सवाल यह है कि घटना हुई ही क्यों? स्वास्थ्य व्यवस्था में अक्सर किसी हादसे के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट तैयार होती है और कुछ समय बाद मामला फाइलों में दब जाता है। इस घटना के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए।
जांच हो, लेकिन सिर्फ कागजों पर नहीं
जरूरत इस बात की है कि जांच निष्पक्ष और तकनीकी आधार पर हो। वॉर्मर मशीन की जांच किसी स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ से कराई जाए। विद्युत वायरिंग, प्लग, अर्थिंग, सर्किट और फायर सेफ्टी सिस्टम की भी जांच हो। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। साथ ही जिला अस्पताल के सभी वॉर्मर, इन्क्यूबेटर, ऑक्सीजन सिस्टम और अन्य विद्युत उपकरणों का सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। केवल एक खराब मशीन को बदल देना पर्याप्त नहीं होगा; पूरी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। क्योंकि अस्पताल में मशीनें सिर्फ मशीनें नहीं होतीं, किसी नवजात के लिए वही मशीन उसकी जिंदगी का सहारा होती है।
छिंदवाड़ा अपडेट की सीधी बात
यह हादसा किसी राजनीति का विषय नहीं है और न ही किसी अधिकारी या कर्मचारी को कठघरे में खड़ा करने की जल्दबाजी का। यह उस व्यवस्था को बेहतर बनाने का अवसर है, जिस पर आम आदमी अपनी जिंदगी और अपने बच्चों की जिंदगी का भरोसा करता है। एक नवजात की मौत का दर्द वापस नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर इस घटना की ईमानदार जांच से अस्पताल की एक भी खामी दूर होती है, भविष्य में एक भी बच्चे की जान बचती है और किसी परिवार को ऐसा दुख नहीं झेलना पड़ता, तो यह जांच सार्थक होगी।