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स्टेशनरी दुकानों और शिक्षा माफिया का खेल अब हुआ शुरू

स्टेशनरी दुकानों और शिक्षा माफिया का खेल अब हुआ शुरू
छिंदवाड़ा
14-Apr-26
4 पुस्तकों की कीमत 2-4 हजार रूपए तक

छिंदवाड़ा

शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के पुस्तक मेले की औपचारिकता के बाद स्टेशनरी दुकानों और निजी संचालकों के गठजोड़ ने अब असली खेल शुरू कर दिया है। शिक्षा विभाग और प्रशासन के डर से जिन निजी पब्लिशर्स की पुस्तकों को पुस्तक मेले में नहीं रखा गया था अब वे पुस्तकें खुलेआम स्टेशनरी दुकानों में मिल रही है। चूंकि स्कूलों में पढ़ाई शुरू हो चुकी है तो अब पालकों को मजबूरी में इन निजी पब्लिसर्श की पुस्तकें खरीदनी पड़ रही है।

4 पुस्तकों की कीमतें 3‘से 4 हजार रूपए तक

जिन निजी पब्लिशर्स की पुस्तकों से प्राइवेट स्कूलों पढ़ा रहे हैं उनकी कीमतें सुनकर ही हैरानी होती है। मात्र 4 पुस्तकों की कीमत 3 से 4 हजार रूपए तक बताई जा रही है और ये पुस्तकें पूर्व की तरह कुछ ही स्टेशनरी की दुकानों में उपलब्ध है। छिंदवाड़ा अपडेट ने पहले ही आशंका जताई थी कि पुस्तक मेला आम नागरिकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए लगाया गया है यहां सिर्फ पेन-पेंसिल, रबर, कम्पॉस, बैग, टिफिन बॉक्स और पानी की बोतलें ही मिली। असली किताबें पुस्तक मेले में लाई ही नहीं गई। तीन दिन तक चले पुस्तक मेले से प्रशासन और शिक्षा विभाग ने अपनी पीठ खुद ही थपथपा ली लेकिन आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

बिल और पुस्तक सूची में भी घालमेल

स्टेशनरी संचालकों ने बड़ी ही चालाकी से बिल और पुस्तक सूची में घालमेल किया है। पक्का बिल देते नहीं और जीएसटी भी ले लेते हैं। ग्राहकों द्वारा पुस्तक सूची और बिल मांगने पर टालामटोली की जाती है चूंकि प्रशासनिक दबाव नहीं है दुकानों में भीड़ अधिक होती है इसलिए पालक ज्यादा कुछ कह भी नहीं पाते और मजबूरी में बिल चुकाते हैं।

बड़े स्कूलों का बड़ा खेल

शहर के प्रतिष्ठित और नामचीन स्कूलों में ये खेल खुलेरूप में चल रहा है लेकिन सफेदपोश संरक्षण के चलते प्रशासन कुछ नहीं कर पा रहा है। पालकों को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर वे कहां जाएं और किससे शिकायत करें क्योंकि निजी स्कूल संचालकों की पहुंच और पकड़ राजधानी तक है।

न प्रशासन से राहत और जनप्रतिनिधियों से

विगत दो-तीन वर्षों से चल रहे विरोध का कोई संतोषजनक हल नहीं निकलने से पालक निराश है। न तो उन्हें प्रशासन से कोई राहत मिल रही है और न जनप्रतिनिधियों से। चारों तरफ औपचारिकताएं निभाई जा रही है। ऐसे हालातों में पालकों को मजबूरी में बच्चों के भविष्य को देखते हुए अपनी जेबे ढीली करनी पड़ रही है।




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