नारों और कागजों में ही सिमटकर रह गई शिक्षा व्यवस्था: नकुलनाथ
राजनीति
31-Aug-26
12 वर्षों में कुल बजट में शिक्षा मंत्रालय का शेयर 2.5 प्रतिशत रह गया

छिन्दवाड़ा
जिले के पूर्व सांसद नकुलनाथ ने शिक्षा व्यवस्था पर सरकार को घेरते हुए कहा कि देश के साथ ही प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था नारों और कागजों में ही सिमटकर रह गई है। जमीनी स्तर पर जर्जर स्कूल, स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव, शिक्षकों की भारी कमी और बजट का अभाव शिक्षा के स्तर को लक्षित लक्ष्य से बहुत पीछे धकेल चुका है। सरकार के लिए “बेटी बचाओ..बेटी पढ़ाओ” भी अन्य नारों की तरह ही रहा। अगर इसे पूरी निष्ठा के साथ अमल में लाया गया होता तो महज 55 फीसदी नहीं बल्कि 100 प्रतिशत बेटियां पढ़ रही होती, किन्तु संसद में पेश किए गए शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 22 जनवरी 2015 को यह नारा सरकारी अमल में लाया गया, इसके ठीक दस वर्ष बाद भी केवल 55 प्रतिशत बालिकाएं 9 से 12 वीं कक्षा वर्ग तक पहुंच रहीं है तो सबसे बड़ी समस्या सरकारी प्रयास में है।
पिछले पांच वर्षो। में 17 हजार से अधिक सरकारी स्कूल हुए बंद
श्री नाथ ने शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों का हवाल देते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों में देश में कुल 17,141 शासकीय स्कूल बंद हुए हैं। यानी प्रतिदिन 09 से अधिक शासकीय स्कूल बंद हुए हैं इसमें मप्र भी शामिल है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि हर दो में से केवल एक बालिका ही 9-12 वीं कक्षा वर्ग में अपना दाखिला ले रही हैं, यानी शेष बालिका स्कूल शिक्षा से दूर हो रही है। अब प्रश्न यह उठ रहा है कि भाजपा ने सिर्फ नारा दिया था या उसे जमीनी स्तर पर अमल में लाकर बेटियों को लाभ पहुंचाने का भी कोई मकसद था? शिक्षा का स्तर गर्त में पहुंच रहा है। शिक्षा३शिक्षक और शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी सरकारी नीतियों से त्रस्त है। क्योंकि जहां बच्चे हैं, वहां शिक्षक नहीं, शिक्षक और बच्चे है तो जर्जर स्कूल और अव्यवस्थाओं का अम्बार लगा हुआ है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में कुल बजट में शिक्षा शिक्षा मंत्रालय का शेयर 4.6 से घटकर इस वर्ष 2.5 प्रतिशत रह गया है। इसमें केन्द्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार भी पूरी तरह दोषी है। क्योंकि उन्होंने शिक्षा के बजट को बढ़ाने की बजाए कम किया है।
प्रदेश के स्कूलों में कुल 52,019 पद खाली
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार मप्र में शिक्षा का स्तर ऐसा है कि कक्षा 9 वीं तक आते-आते महज 36 प्रतिशत बच्चे ही गणित के सवाल हल कर पाते हैं, इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह बच्चों की तुलना में शिक्षकों की कमी, शिक्षकों पर थोपे जाने वाले अतिरिक्त कार्य जिसके चलते वे अपना मूल शैक्षणिक कार्य छोड़कर अन्य कार्यों में अधिक समय दे रहे हैं। मप्र की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की भारी कमी सामने आई है। प्रदेश के स्कूलों में कुल 52,019 पद खाली है इनमें भी 47,122 पद सिर्फ प्रारंभिक स्तर के है, यानी कुल रिक्तियों का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा प्राइमरी स्कूलों का ही है। यानी शिक्षा की नींव को मजबूत करने के लिए शिक्षकों की भारी कमी है जिस पर सुधार के लिए सरकार को गम्भीरता से कान और ध्यान देना चाहिए।