शंकू आकार में विराजमान हैं अनगढ़ हनुमान का जानिए इतिहास
धर्म
01-Apr-26
श्रद्धा, आस्था और विश्वास के सौ वर्ष
छिंदवाड़ा
अधिकांशतः भगवान जी की मूर्तियों को कलाकार द्वारा गढ़ा जाता है फिर मंदिरों में उनकी प्राण प्रतिष्ठा कर पूजा जाता है लेकिन शहर में एक मंदिर भी है जहां बिना गढ़े ही भगवान की प्रतिमा को हनुमान जी महाराज के रूप में पूजा जा रहा है। लगभग 100 वर्ष हो चुके हैं श्रद्धा, आस्था और विश्वास के जिन्हें हम स्वयंभू हनुमान कहे या अनगढ़ हनुमान। प्रसिद्धि इतनी की हर आने-जाने वाला व्यक्ति श्रद्धा से सिर झुका ही लेता है।
केवल मुख के होते हैं दर्शन
शहर के बड़े-बुजुर्गों ने अनगढ़ हनुमान मंदिर की सत्यकथा से पर्दा हटाते हुए बताया कि अनगढ़ हनुमान मंदिर में विराजमान स्वयंभू हनुमान जी की प्रतिमा जो शंकु के आकार में है जिसमें केवल मुख के दर्शन होते हैं। मूर्ति का शेष हिस्सा धरती के अंदर ही है, जिसकी लंबाई 16 फिट है। शंकु की तरह दिखने वाली शिला में दो आंखें, नाक, मुख साफ दिखाई देते हैं। हनुमान जी का शीर्ष भी दिखाई देता है। बाकी की आकृति जमीन के तलघर में है। नीचे जाने की अनुमति सिर्फ मंदिर के महंत योगीराज श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री नागेंद्र ब्रह्मचारी जी को ही है। वह ही हनुमान जी की चरण वंदन करते हैं।
पहली बार 1926 में दर्शन
किवदंती है कि हनुमान जी की प्रतिमा अति प्राचीन और स्वयंभू है। सन 1926 में नागपुर के चिटनवीस छिंदवाड़ा आए थे। इस दौरान उनका बच्चा गंभीर बीमारी से ग्रस्त था जिसे लेकर वे बहुत परेशान थे। उन्होंने इस हनुमान शिला के दर्शन कर बेटे के लिए हनुमान जी से प्रार्थना की। प्रार्थना का असर चमत्कारिक था। उनके बीमार बेटे की स्थिति में सुधार आने लगा वह स्वस्थ हो गया।
छोटी सी मढ़िया से भव्य मंदिर तक
बताया जाता है कि पहले यहां घना वन था। श्री चिटनवीस द्वारा यहां छोटी सी मढ़िया का निर्माण कराया गया। इसके बाद अन्य लोग भी अपनी समस्याओं को लेकर यहां आने लगे। धीरे-धीरे यह स्थान ख्याति प्राप्त करने लगा। एक औघड़ महाराज हनुमान जी की नित्य पूजन अर्चन करते थे जो भी बीमार आता है, उसे भस्मी देकर हनुमान जी से प्रार्थना के लिए कहते हैं जिससे लोगों को लाभ मिलता। वहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। 1974-75 में बाल ब्रह्मचारी योगीराज नागेंद्र ब्रह्मचारी जी का यहां आगमन हुआ। उन्होंने इस स्थान को अपनी कर्म स्थली बनाकर पास ही झोपड़ी में तपस्या करने लगे। उन्होंने ही मढ़िया से भव्य हनुमान मंदिर बनाने का संकल्प लिय और सुबह-शाम पूजन-पाठ आरती कर हनुमान जी की सेवा करने लगे।
बड़ी प्रतिमा कैसे हुई स्थापित
हर शनिवार को श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहने लगी। महाराज जी ने स्वयं मंदिर में एक-एक ईंट मसाला लगाकर मंदिर का गर्भगृह बनाया फिर श्रद्धालुओं का मंदिर से जुड़ना प्रारंभ हुआ। महाराज जी द्वारा 51 वर्षों से लगातार प्रवचन, भागवत कथा, राम कथा की जाने लगी। उससे प्राप्त राशि से मंदिर का स्वरूप भव्य होने लगा। साथ ही आज जिस जगह पर हनुमान जी की बड़ी प्रतिमा स्थापित है उस स्थान पर मंदिर के पुजारी जी बैठक करते थे। वहां एक बंदर प्रतिदिन आकर सुबह से बैठता और रात्रि में आरती के बाद वहां से चला जाता था। वह कहां जाता, पता ही नहीं चलता।
कुछ पुराने भक्तों ने बताया कि एक पुजारी हुआ करते थे जो की हनुमान जी की सेवा करते थे। कुछ समय बाद उनका देहांत हो गया। पुजारी जी के देहांत के बाद वह बंदर प्रतिदिन इस स्थान पर आकर बैठने लगा। उसके बाद मंदिर के वर्तमान महंत नागेंद्र जी वह हनुमान जी की बड़ी प्रतिमा का निर्माण करना चाहते थे। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह बंदर कभी दिखाई नहीं दिया भक्तों का मानना है कि मूर्ति स्वयं बजरंगबली की प्रेरणा से बनी है।
भगवान की आस्था को तहसीलदार की चुनौती
भक्तों ने बताया कि 1999-2000 में एक तहसीलदार मुखर्जी ने बजरंगबली की मूर्ति पर आपत्ति जताई और प्रतिमा तोड़ने की बात भी कहीं। मंदिर पर आर्थिक दंड भी लगाया, ब्रह्मचारी जी ने आर्थिक दंड जमा किया। कुछ ही दिन में तत्कालीन अधिकारी को लगवा ग्रस्त होना पड़ा साथ ही उसके परिवार में अप्रिय घटना भी हुई । अधिकारी का तबादला भी हो गया। इस विशालकाय प्रतिमा से भक्तों की आस्था भी जुड़ी है।
तलघर में होती साधना
स्वयंभू प्रतिमा जिनका केवल शीर्ष की पूजन होती आई है उसे बाहर निकालने के काफी प्रयास भी किए गए लेकिन स्वयंभू प्रतिमा ने नागेन्द्र जी को सपने में बाहर निकालने से पूर्ण मना किया। इस घटना के बाद तलघर का रास्ता बनाया गया जिनकी चरण वंदना केवल ब्रह्मचारी जी के द्वारा साधना और पूजन की जाती है। शहर के बीचों-बीच यह विशालकाय प्रतिमा अनगढ़ हनुमान मंदिर में विराजमान है और पूरे शहर की निगरानी करते हैं। हनुमान जी की प्रतिमा का आकर्षण इतना अधिक है कि राह से गुजरने वाले भक्तों का ध्यान स्वयं मूर्ति में आ जाता है और वह मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच जाते हैं।
मंदिर में वर्ष भर चलते रहते हैं धार्मिक आयोजन
प्रतिदिन गीता पाठ, नववर्ष आगमन, रंगपंचमी, चैत्र नवरात्र, घट स्थापना, श्री रामनवमी, हनुमान जन्मोत्सव, राम कथा, गुरु पूर्णिमा, सावन माह में 40 शिवलिंगों का अभिषेक, हरियाली तीज, चारों ज्योतिर्लिंग की स्थापना अभिषेक, अमरनाथ शिवलिंग, जन्माष्टमी, कृष्ण कथा, छठी, गणेश स्थापना, क्वांर नवरात्र घट, देवी स्थापना, कार्तिक मास में 1 माह विष्णु सहस्त्र नाम, दीपावली, सालभर प्रति शनिवार भंडारा सहित अनेक धार्मिक आयोजन यहां होते हैं जिसमें श्रद्धालु आस्था और विश्वास के साथ उपस्थित रहते हैं।
साभार: कृष्णा सेठिया