रोजी-रोटी से बड़ी है सूबे के मुखिया की सुरक्षा ?
छिंदवाड़ा
10-Dec-25
छिंदवाड़ा
देश में सत्तासीन पार्टी से चुने गए देश के मुखिया जिनकी छवि जनमानस में गरीबों को आवास देने से लेकर भूखों को अनाज देने के लिए जानी जाती है उसी पार्टी से सूबे के मुखिया के आगमन पर उनकी सुरक्षा के दृष्टिकोण से की गई पुलिसिया कार्रवाई ने कई गरीबों को एक दिन भूखे पेट सोने मजबूर कर दिया। उसी पार्टी से जिले के मुखिया के घर विवाह समारोह में शामिल होने वाले सूबे के मुखिया को एक से बढ़कर एक अच्छे पकवान के भोग लगाए जा रहे थे तो दूसरी ओर तीनों मुखिया (जैसा की अक्सर अपने भाषणों में जनता को अपना परिवार मानते हैं) के ही परिवार के सदस्य भूखे पेट पानी पीकर सोने को मजबूर हो गए।
पार्टी के जिला स्तरीय मुखिया ने बुलाया तो सूबे का मुखिया आया यहां तो सबकुछ ठीक है लेकिन सूबे के मुखिया की सुरक्षा क्या किसी की रोजी-रोटी से बढ़कर हो गई? स्वयं को जनता सेवक मानने वाले जिले से लेकर सूबे तक के मुखिया और पुलिस प्रशासन को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उनके अधिकारों से किसी और के अधिकारों का हनन न हो। खासकर जब रोजी-रोटी की बात हो तब। रोजी-रोटी के अलावा शिक्षा के लिए फीस हो या फिर घर के बीमार सदस्य के लिए दवाईयों का खर्च सबकुछ इसी से चलता है। ये वही जनता है जिनसे मुखिया कहलाते हो, ये वही जनता है जिनकी सेवा और सुरक्षा पुलिस विभाग का मूल तत्व है? देश का मुखिया तो गरीबों की संवेदनाओं को समझ रहा है और उन्हीं संवेदनाओं के कारण एक बड़ा जनमानस उनकी पार्टी से जुड़ा है। बात बस समझने की है उनसे नीचे के मुखियाओं को, फिर चाहे जिलास्तर पर या सूबे के स्तर पर। जनता है जाने कब क्या समझ जाए......।