शिव-भक्ति और सनातन की समन्वयकारी दृष्टि
धर्म
25-Aug-26
महादेव, मेरी आत्मा, मेरा जीवन
मेरे लिए भगवान शिव केवल आराध्य देव नहीं हैं, वे मेरी आस्था, मेरी आत्मा, मेरा जीवन और मेरे अस्तित्व का आधार हैं। बचपन से ही उनके प्रति जो श्रद्धा मेरे मन में जागी, वह समय के साथ केवल पूजा तक सीमित नहीं रही; वह जीवन-दृष्टि बन गई। परिवार में भगवान शिव का मंदिर होना मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं।
शिवलिंग के सम्मुख बैठना, “ॐ नमः शिवाय” का स्मरण करना और महादेव की शांत, करुणामयी एवं विराट छवि का ध्यान करना भीतर एक ऐसी शांति देता है, जिसे शब्दों में पूर्णतः व्यक्त करना कठिन है।
शिव शब्द का ही अर्थ है, मंगल, कल्याणकारी और शुभ। वैदिक परंपरा में रुद्र की स्तुति करते हुए यजुर्वेद का श्रीरुद्रम उन्हें समस्त जगत में व्याप्त और कल्याणकारी शक्ति के रूप में प्रणाम करता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है - “एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः” अर्थात् वह रुद्र एक है, उसके समान दूसरा कोई नहीं। (श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.2)
सनातन परंपरा में वे महादेव हैं, देवों के भी देव। वे कैलासवासी हैं, योगेश्वर हैं, नटराज हैं, पशुपति हैं, नीलकंठ हैं, भोलेनाथ हैं और विश्वनाथ हैं। उनका व्यक्तित्व विरोधाभासों का अद्भुत समन्वय है, वे संन्यासी भी हैं और गृहस्थ भी; ध्यानमग्न योगी भी हैं और तांडव के नटराज भी; भस्म धारण करने वाले विरक्त भी हैं और माता पार्वती के सहचर भी।
उनकी प्रतिमा का प्रत्येक प्रतीक अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश रखता है। जटाओं में गंगा ज्ञान और जीवनधारा का प्रतीक है; मस्तक पर चंद्रमा मन की शीतलता और समय-चक्र का संकेत देता है; तीसरा नेत्र विवेक और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है; कंठ का विष यह सिखाता है कि संसार की कटुता को अपने भीतर धारण करके भी उसे दूसरों तक विष के रूप में नहीं पहुँचाना चाहिए। त्रिशूल प्रकृति के तीन गुणों और जीवन के अनेक द्वंद्वों पर नियंत्रण का संकेत माना जाता है, जबकि डमरू सृष्टि के नाद और चेतना की स्पंदनशीलता का प्रतीक है।
महादेव के गले में सर्प और शरीर पर भस्म हमें मृत्यु और भय के सत्य से भी परिचित कराते हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि जो नश्वर है, उसके अहंकार में डूबना व्यर्थ है। श्मशानवासी शिव जीवन की अंतिम सच्चाई से आँखें नहीं चुराते। वे मृत्यु के भय के पार स्थित उस चेतना का स्मरण कराते हैं जिसे उपनिषद् आत्मतत्त्व कहते हैं।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “रुद्राणां शङ्करश्चास्मि” अर्थात् रुद्रों में मैं शंकर हूँ। (गीता 10.23) यह वचन सनातन धर्म की उस गहरी दृष्टि को प्रकट करता है जिसमें विभिन्न देव-रूप अंततः एक ही परम तत्त्व की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।
इसी भाव को ऋग्वेद का प्रसिद्ध वाक्य व्यक्त करता है-“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। (ऋग्वेद 1.164.46)
इसीलिए शिव और विष्णु को लेकर विवाद करना सनातन दृष्टि के मूल भाव के विपरीत है। पुराणों में हरिहर की समन्वयकारी अवधारणा इसी एकत्व को दर्शाती है। शिवभक्त के लिए शिव सर्वाेच्च आराध्य हो सकते हैं और वैष्णव के लिए विष्णु, पर इससे दूसरे की भक्ति छोटी नहीं हो जाती। भक्ति का मूल्य प्रतियोगिता में नहीं, प्रेम में है।
महादेव की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनका भेदभावरहित करुणामय स्वरूप है। पुराण-कथाओं में देव, दानव, गण, ऋषि, साधक और सामान्य मनुष्य, अनेक प्रकार के पात्र शिव की शरण में आते हैं। वे बाहरी वैभव से अधिक भाव को स्वीकार करने वाले देवता के रूप में पूजित हैं। इसीलिए वे भोलेनाथ कहलाते हैं। उन्हें महंगे उपहारों की आवश्यकता नहीं, बेलपत्र, जल और निष्कपट हृदय ही पर्याप्त माने जाते हैं।
शिवभक्ति का वास्तविक अर्थ केवल मंदिर जाकर पूजा करना नहीं है। शिवत्व को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है, अहंकार को त्यागना, क्रोध पर नियंत्रण रखना, निर्बल की सहायता करना, प्राणियों के प्रति करुणा रखना, सत्य के लिए खड़ा होना और भीतर की अशांति को ध्यान एवं आत्मचिंतन से शांत करना।
शिव का परिवार भी हमें समन्वय का संदेश देता है। माता पार्वती शक्ति हैं, गणेश बुद्धि और मंगल के प्रतीक हैं, कार्तिकेय वीरता और अनुशासन के, नंदी समर्पण और निष्ठा के। शिव और शक्ति का संबंध हमें याद दिलाता है कि चेतना और शक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
अंततः मेरे लिए महादेव कोई दूर बैठे देवता नहीं हैं। वे मेरे भीतर की शांति में हैं, मेरी प्रार्थना में हैं, मेरे संघर्ष में हैं और मेरी सांसों में हैं। जब जीवन कठिन होता है, मैं उन्हें याद करता हूँ; जब जीवन में सफलता मिलती है, तब भी उन्हें धन्यवाद देता हूँ। मेरी सबसे बड़ी प्रार्थना यही है।
“हे महादेव! मुझे ऐसा जीवन दीजिए जिसमें अहंकार कम हो, करुणा अधिक हो; शिकायत कम हो, कृतज्ञता अधिक हो; भय कम हो, विश्वास अधिक हो। मेरे भीतर के अज्ञान का तीसरा नेत्र खोल दीजिए और मेरे जीवन को शिवमय बना दीजिए।”