सिर्फ बैग, रबर, पेन-पेसिंग और कॉपियों में सिमटा पुस्तक मेला
लेख
05-Apr-26
समीक्षक - राम कुमार विश्वकर्मा
प्रशासन की पहल तो अच्छी है लेकिन शहर के बड़े निजी स्कूलों की पुस्तकें मेले में कहीं भी दिखाई नहीं दी। कई स्टेशनरी संचालकों के काउंटर समय से पहले ही बंद हो गए और कई ने पंजीयन तो कराया लेकिन काउंटर खोला ही नहीं। जो काउंटर खुले थे वहां पालकों द्वारा पूछने पर स्टेशनरी विक्रेताओं ने कहा अभी आने की है। दो दिन का मेला समाप्ति की ओर है इसका सीधा मतलब है निजी स्कूल संचालकों और स्टेशनरी विक्रेताओं ने ऐसी व्यूहरचना रची कि प्रशासन और शिक्षा विभाग का मान भी रखा जाए और हमारा काम पूर्व की तरह ही चलता रहे।
पुस्तक मेले में आए पालकों को सिर्फ कॉपियां, बैग, रबर, पेन-पेसिंग की खरीदी से ही काम चलाना पड़ा। निजी स्कूल संचालकों और स्टेशनरी विक्रेताओं की सांठगांठ की एक भी गांठ नहीं खोल पाया शिक्षा विभाग। बड़ी ही चतुराई से निजी स्कूल संचालकों और स्टेशनरी विक्रेताओं ने कमीशनखोरी की एक भी परत नहीं खुलने दी। इधर शिक्षा विभाग और प्रशासन को भी अपनी पीठ थपथपाने का अवसर मिल गया कि हमने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी। बेइमानी एक बार फिर ईमानदारी का चोला ओढ़कर बच निकली और पालक, प्रशासन और विभाग तमाशाबीन बनकर रह गए।
मेले की अवधि कम से कम 4 चार दिन की हो
हजारों विद्यार्थियों और उनके पालकों के लिए संभव नहीं है कि दो दिन में वे पुस्तक मेले का लाभ उठा पाए। इतनी कम अवधि के कारण कई पालक पुस्तक मेले का लाभ नहीं उठा पाए। फिर पुस्तक मेले का सही ढंग से जनता में प्रचार-प्रसार भी नहीं किया गया जिसके कारण कई पालकों तक पुस्तक मेले की सूचना भी नहीं मिल पाई। शिक्षा विभाग को कुल मिलाकर पुस्तक मेले का व्यापक प्रचार-प्रसार और समयावधि दोनों को भी और अधिक महत्व देना चाहिए।
जबलपुर कलेक्टर जैसी मिसाल कायम होनी चाहिए
शिक्षा सत्र शुरू होने के पूर्व ही मीडिया की खबरों पर संज्ञान लेते हुए जबलपुर कलेक्टर दीपक सक्सेना ने पूर्व के वर्षों में निजी स्कूलों और स्टेशनरी संचालकों पर कानून का जो शिकंजा कसा था उस समय आम नागरिकों और पालकों को थोड़ी राहत सांस महसूस हुई थी और एक उम्मीद भी जगी थी कि जबलपुर की पहल प्रदेश में मिसाल बनेगी लेकिन अफसोस ऐसा हो नहीं पाया।
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से ईमानदार पहल की अपेक्षा
क्या पुस्तक मेले को लेकर सचमुच प्रशासन और शिक्षा विभाग ईमानदार है इस बात पर प्रश्नचिन्ह है क्योंकि प्रशासन और शिक्षा विभाग की सख्ती होगी तभी आम पालकों को निजी स्कूलों और स्टेशनरी संचालकों की लूट से राहत मिलेगी। मीडिया का काम है जन समस्याओं को उठाना और जनप्रतिनि और प्रशासन का काम है समस्याओं को दूर करना। आम जनमानस की अपेक्षा है जब भी काम हो तो पूरी ईमानदारी से हो। जब काम ईमानदारी से होगा तो जनमानस स्वयं ही राहत महसूस करेगा और ईमानदार प्रशासन की जय जयकार करेगा।