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पर्यूषण पर्व - उत्तम संयम धर्म

पर्यूषण पर्व - उत्तम संयम धर्म
धर्म
02-Sep-25
संकलन:  डॉ उदय जैन (पूर्व प्राचार्य, पी.जी.कॉलेज छिंदवाड़ा) इंदौर

मन, वचन, काय की अशुभ प्रवत्तियों का त्याग कर व्रत, नियम तथा पांच समितियों का पालन करना,  अपनी इन्द्रियों को वश में करना तथा समस्त प्राणियों की रक्षा का भाव रखना व्यवहार से उत्तम संयम धर्म कहलाता है। द्रव्य हिंसा का अभाव व्यवहार संयम तथा भाव हिंसा का अभाव निश्चय संयम कहलाता है। इसलिए हमारा हमेशा अपने भावों पर नियंत्रण रहना चाहिए।

संयम दो प्रकार का होता है

1. प्राणी संयम- पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय के जीवों की  रक्षा करना तथा करने का भाव निरंतर होना, प्राणी संयम कहलाता है

2. इन्द्रिय संयम- पांच इन्द्रियों स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण और मन को नियंत्रण में रखना तथा नियंत्रित रखने का निरंतर भाव होना, इन्द्रिय संयम कहलाता है। 
इन्द्रिय संयम किये बिना प्राणी संयम होता नहीं इसलिए इन्द्रिय संयम मुख्य है। हमारा मन और इन्द्रियां हमारी आत्मा को अपने- अपने विषयों की ओर आकृष्ट  करके पथभ्रष्ट करती हैं। हमें आत्म विमुख करके अन्य सांसारिक भोगों में तन्मय कर विवेक शून्य कर देती हैं।

इस दुर्लभ मनुष्य पर्याय में ही संयम होता है तथा मिथ्यादृष्टियों को एवं नीच- कुलादि में जन्म लेने वाले को, अधम- देशों में जन्म लेने वाले को, इन्द्रिय विषयों में रत रहने वाले को, ज्ञान नहीं होने पर होने पर, रोगी, दरिद्री, अन्याय मार्गी, विषयानुरागी, तीव्र कषायी, निंद्यकर्मी होने पर कभी संयम के भाव नहीं होते।

हम अपने से बलहीन की हिंसा तन से उसे चोट पंहुचा कर या वचन से अपशब्द बोलकर कर देते हैं, कहीं कोई बलशाली टकरा गया तो प्रत्यक्ष तो उसका कुछ नहीं कर पाते परंतु रौद्रध्यान करके भाव हिंसा करते हैं

संयम चार प्रकार से होता हैः-

1. अर्थ या द्रव्य संयम- पुण्य के उदय से हमें जो धन सम्पत्ति मिली है उसमें संतुष्ट रहना तथा  छल -कपट करके धन संपत्ति एकत्र न करना द्रव्य संयम है।

2. क्षेत्र का संयम - हमारी इंद्रियां हमारे नियंत्रण में रहना क्षेत्र संयम है, इसलिए जहां इंद्रियों पर से नियंत्रण छूटने की संभावना हो, ऐसे स्थानों पर हमें नहीं जाना चाहिए।

3.  काल या समय संयम- आज जब हमारे चारों ओर अनुकूलता है तो हम कहते हैं कि हमारे पास बिल्कुल समय नहीं है और जब प्रतिकूलता होती है, घर में बीमारी आ जाती है, व्यापार चलना कम हो जाता है, नौकरी छूट जाती है तब हमें भगवान की याद आती है, इसलिए प्रतिदिन स्वयं को और जिनेंद्र परमात्मा को याद करने का समय निकालना चाहिए।

4. भाव संयम - हमारा मन और उसमें उत्पन्न होने वाले विचारों पर नियंत्रण होना भाव संयम है।

संयमित जीव को

 1. किसी बात पर क्रोध नहीं आता।
2. वह किसी बात पर अभिमान नहीं करता।
3. वह कुछ पाने के लिए मायाचारी नहीं करता।
4. वह किसी पदार्थ को पाने के लिए लोभ नहीं करता झूठ का, छल -कपट का सहारा नहीं लेता।
  
संयम पालन करने से लाभ-

1. संयम आत्मा का हित करने वाला है।
2. चारित्र का पालन करने से मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।
3. संयम से समस्त पाप कर्मों का संवर होता है और पूर्व बद्ध पाप कर्मों की निर्जरा भी होती है।
4. संयम के साथ किया हुआ तप साधक को मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है।

जबकि संयम नहीं पालने से-

1. हमारे तप ,ध्यान और व्रतादि सार्थक नहीं होते।
2. बिषयों में सुख की मान्यता बनी रहती है।
3. हिंसा नंदी रौद्र ध्यान के भाव सदैव बने रहते हैं।
4. और पाप कर्मों का आश्रव होता है।
        इसलिए रत्नत्रय की विशुद्धि के लिए तथा मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने के लिए पूर्ण पुरूषार्थ के साथ संयम धर्म का पालन करना चाहिए
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