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पर्यूषण पर्वाधिराज पांचवां दिन ‘उत्तम शौच धर्म’

पर्यूषण पर्वाधिराज पांचवां दिन ‘उत्तम शौच धर्म’
धर्म
01-Sep-25
संकलन:  डॉ उदय जैन (पूर्व प्राचार्य, पी.जी.कॉलेज छिंदवाड़ा) इंदौर

ध्यानत राय जी की दशलक्षण पूजा में उत्तम सत्य धर्म को चौथा और उत्तम शौच धर्म को पांचवा कहा है। क्योंकि जब तक जीवन से झूठ नहीं जाएगा तब तक जीवन से आशक्ति नहीं जाएगी एवं पवित्रता नहीं आयेगी। इसीलिए शौच धर्म को पांचवां पर्व माना जाता है। शौच/शुचि का अर्थ होता है शुद्धि या पवित्रता। शौचधर्म का प्रयोजन आत्मा को पवित्र करने से है, इसका इस देह की शुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं मानना चाहिए। अपनी आत्मा को जो लोभ रूपी मल से मलिन है उसे पवित्र करने का भाव होना ही शौचधर्म है।
आत्मा के साथ बंधे कर्मों के उदय से हमारे क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषाय के तथा इंद्रिय जन्य दुष्ट वासनाओं को बढ़ाने वाले विषय भोग रूपी विष के भाव होते हैं। भेदज्ञान पूर्वक इन भावों को अनित्य, विनाशकारी जानकर, ज्ञान रूपी जल से इन कर्म मलों को निर्जरित करना ही शौच धर्म कहलाता है। यदि हम इस शरीर को स्नानादि से साफ़ कर लेने को शौच मानते हैं, या गंगा आदि नदियों में स्नान करने को शुद्धि मानते हैं, तो हम मिथ्या दृष्टि हैं, क्योंकि जो शरीर स्वयं ही मल से बना है, जिसके नौ द्वारों से मल नियमित रिसता रहता है वह स्नान करने से कभी शुद्ध नहीं हो सकता ।
         विषयों के प्रति आसक्ति, भोग उपभोग की वस्तुओं के प्रति आसक्ति एवं उन्हें पूरा करने के लिए धन इकट्ठा करना लोभ कहलाता है। लोभ या लालच का संबंध केवल पैसे से ही नहीं है, अपितु किसी भी वस्तु के प्रति अधिक आसक्ति लोभ कहलाती है। लोभ को मिथ्यात्व का बाप और पाप का दादा जाता है सारे पापों की जड़ यह लालच ही है। हम जानते हैं कि लालची जीव किसी भी अवस्था में संतुष्टि को प्राप्त नहीं होता वह सदैव असंतुष्ट रहता है, तथा संकल्प विकल्प में उलझा रहकर आकुलित रहता है, असंतुष्ट जीव की आशाएं, अपेक्षाएं कभी भी समाप्त नहीं होती। लालची जीव अपनी विषय पूर्ति के लिए समय आने पर चोरी, मायाचारी, छल- कपट, हिंसा, परिग्रह, बैर- भाव भी करता है। लोभ 4 प्रकार होता है:-

1.जीवन को अधिक जीने का लोभ
     यदि हमें अधिक समय तक जीने का लोभ है तो हमने आयु कर्म के सिद्धांत को नहीं समझा है और उम्र बढ़ाने के लिए हम लोक मूढ़ता में उलझ जाते हैं अर्थात बेटे की आयु बढ़ाने के लिए, पति की आयु बढ़ाने के लिए मिथ्या व्रत आदि करने लगते हैं

2.सदैव निरोगी रहने का लोभ
        यदि हमें लगता है कि हम सदैव निरोगी बने रहें तो हमने कर्म सिद्धांत में असाता वेदनीय कर्म और अशुभ नाम कर्म के उदय से क्या होता है इसे नहीं जाना है और हम निरोगी रहने के लिए विभिन्न लोगों द्वारा फैलाए गए माया जाल में कुदेव आदि की पूजा करने लगते हैं अर्थात देव मूढता में उलझ जाते हैं

3. इन्द्रियों के विषयों को भोगने का लोभ
        यदि हमें इंद्रियों विषयों को भोगने का लोभ है तो इसका अर्थ है कि हमने वाह्य पदार्थों में सुख माना है, जबकि वाह्य पदार्थों में सुख नहीं है वह सुखाभास है

4.भोग्य सामग्री एकत्रित करने का लोभ
       यदि हमें यह लोभ बना हुआ है तो हमने अंतराय कर्म के उदय को नहीं समझा है, क्योंकि अंतराय कर्म के क्षयोपशम अनुसार ही भोग भोगने को मिलते हैं इसलिए ऐसा न मानने पर हमारा मिथ्या श्रद्धान कभी भी छूटने वाला नहीं है
       दूसरे का वैभव, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, प्रतिष्ठा, प्रभाव, स्त्री, संतान, धन, संपत्ति इत्यादि देख कर यदि हमें ईर्ष्या होती है तो हमें कर्म सिद्धांत को समझना चाहिए और जिनेंद्र परमात्मा की वाणी अनुसार सच्ची श्रद्धा करना चाहिए
        अत्यन्त दुर्लभता से प्राप्त मनुष्य पर्याय में हमारे पास जो है जितना है वह हमें हमारे पूर्व जन्मों में बांधे गए कर्मों के उदय अनुसार मिला है  उसी में संतोष कर अशुभ भावों का अभाव करके आत्मा की शुचि करना ही शौच धर्म कहलाता है। आत्मा की शुचि/निर्मलता ही मोक्ष का मार्ग है
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