राजनीति में कुत्ते के बाद चूड़ी की एंट्री
लेख
01-Sep-25
और कितना गिरेगा राजनीतिक घमासान
समीक्षक - राम कुमार विश्वकर्मा
जिले की राजनीति में वर्तमान परिदृश्य ऐसा दिखाई दे रहा है जिसका न कोई लक्ष्य न कोई प्राप्ति। तत्कालिक और क्षणिक लाभ पाने की लालसा में राजनीतिक विरोध का स्तर दिनोंदिन नैतिकता खो रहा है। नेताओं में नैतिकता होती तो राजनीतिक गरिमा का स्तर कुत्ते से होते हुए चूड़ी तक नहीं पहुंचता।
पूर्व में यूरिया के लिए किया गया आंदोलन कुत्ते को ज्ञापन पर आकर समाप्त हुआ। उसके बाद ऐसा लगा जैसे छिंदवाड़ा से यूरिया संकट ही खत्म हो गया। आंदोलन वाकई में किसानों की समस्या को उजागर करने के लिए किया गया था या विरासत में मिली छिंदवाड़ा की राजनीति में शक्ति प्रदर्शन था इसे अब तक आम जनता और किसान समझने का प्रयास कर रहे हैं। अच्छा होता एक बड़ा आंदोलन करने के बजाए ब्लाक स्तर पर बड़े नेता छोटा आंदोलन कर अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करते। इस आंदोलन से एक दिन की राजनीतिक चमक मिली लेकिन वह भी ज्यादा देर नहीं टिक पाई। आंदोलन का अंतिम समय किसान, कांग्रेस, कलेक्टर और कुत्ते में सिमट
गया। आंदोलन का मुख्य विषय पीछे छूट गया और कुत्ता ज्यादा चर्चा का विषय बन गया।
कुछ ऐसा ही नजारा विगत दिनों दिखाई दिया। एक आंदोलन महिला अधिकारों के लिए शुरू हुआ लेकिन आंदोलन की दिशा बदली और वह शराब माफिया तक पहुंच गया। लाठी-डंडे लेकर धमकाने से लेकर तोड़-फोड़ तक हुई। कानून हाथ में लेना अपराधिक हो सकता था लेकिन फिर भी राजनीति के साथ प्रशासन ने संयम का परिचय दिया। इसके बाद आंदोलन और उग्र हुआ तो उसने आंदोनकर्ता की दिशा बदल दी। जिन्हें प्रतिकात्मक चूड़ियां पहनाई गई थी उनके नुमाइन्दों ने हथकड़ी पहना दी।
अपनी बात उन लोगों तक पहुंचाना जो नीति निर्धारक है, आंदोलन करना अच्छा मार्ग है लेकिन वह जहां भी नैतिकता और गरिमा खोएगा, गर्त में चला जाएगा। हमारे गांव-कस्बों में आज भी विवाहित महिलाओं के लिए चूडियां नैतिकता का प्रतिनिधत्व कर रही है। आधुनिक सोच में नैतिकता नहीं रहेगी तो वह केवल सोच में गिरावट नहीं लाती है बल्कि सोचने वाले के पतन का कारण भी बन जाती है। देव से लेकर दानव तक पौराणिक और ऐतिहासिक उदाहरण हमारे देश में भरे पड़े हैं। इसमें कोई संशय नहीं है कि इसके पूर्व जिले की राजनीति में नैतिकता का स्तर ऊंचा रहा है इसलिए वह विजय का कारण बना रहा लेकिन जैसे-जैसे नैतिकता का स्तर कम होता जाएगा वह न केवल रानीतिक रूप से बल्कि स्वयं के पतन का कब कारण बन पता ही नहीं चलेगा।