कांग्रेस, किसान आंदोलन, कलेक्टर और कुत्ते को ज्ञापन
लेख
21-Aug-25
जनता की नजर में कितना सही-कितना गलत
समीक्षक - राम कुमार विश्वकर्मा
छिंदवाड़ा
राजनीति के इतिहास में यह पहला अवसर होगा जब कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का जिले में आगमन हुआ, प्रदेश सरकार का जोरदार विरोध हुआ, यूरिया की कमी को जबरदस्त तरीके से जनता के सामने लाया गया लेकिन आखिरी पड़ाव में इस आंदोलन में जो हुआ उसने आंदोलन के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं की सोच-समझ को आम जनमानस में ‘कुत्ता’ साबित कर दिया। गांधी को आदर्श मानने वाली कांग्रेस सत्ता का विरोध करते-करते ‘कुत्तावादी’ संस्कृति में प्रवेश कर गई यह आम जनमानस के साथ-साथ कांग्रेस के नीति निर्धारकों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। गांधी के विचार जनमानस पर इसलिए छाप छोड़ते थे क्योंकि उनका तरीका अहिंसक के साथ-साथ सभ्य और शालीन भी होता था। आंदोलन में भी आदर्श से जनता में उनकी लोकप्रियता बढ़ती थी तो अंग्रेज भी डर जाते थे लेकिन छिंदवाड़ा में 20 अगस्त को ‘कांग्रेस, किसान आंदोलन, कलेक्टर और कुत्ता’ ने तीनों को गरिमाहीन कर दिया।
कुत्ते को ज्ञापन देने की घटना ने छिंदवाड़ा के कलेक्टर की गरिमा को ही कम नहीं किया बल्कि छिंदवाड़ावासियों के मन में कांग्रेस के प्रति प्रेम भी कम किया है क्योंकि छिंदवाड़ा की जनता का मानना है कि आंदोलन तो उचित था यह समय की मांग भी थी, सबकुछ ठीक था लेकिन ठीक नहीं था तो सिर्फ कांग्रेस नेताओं की कलेक्टर को ज्ञापन देने की जिद और कलेक्टर के नहीं आने पर कुत्ते के गले में ज्ञापन बांधकर कलेक्टर को कुत्ते की संज्ञा से महिमामंडित की रणनीति। जनता सबकुछ देख रही है, समझ भी रही है यदि कांग्रेस ‘‘कुत्तावादी संस्कृति’’ को आगे बढ़ाएगी तो निःसंदेह कमलनाथ की कांग्रेस का स्तर नकुलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस में गिरेगा।
पहला आंदोलन जिसमें कमलनाथ नहीं थे
छिंदवाड़ा की जनता ने किसान आंदोलन में कमलनाथ की कमी को महसूस किया। उनका मानना है कि यदि कमलनाथ इस आंदोलन में उपस्थित रहते तो कांग्रेस को ‘कुत्तावादी संस्कृति’ से स्वतः दूर रखते क्योंकि उन्हें छिंदवाड़ा की संस्कृति की समझ है। 35 वर्षों से छिंदवाड़ा के जनमानस को बहुत करीब से समझा है। छिंदवाड़ा की जनता इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेगी कि सत्ता का विरोध छिंदवाड़ा की राजनीति को ‘कुत्ताछाप’ बना दे।