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तुलसी जयंती विशेष: बिनु सतसंग बिबेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई

तुलसी जयंती विशेष: बिनु सतसंग बिबेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
धर्म
19-Aug-26
छिंदवाड़ा

भारत वर्ष की संस्कृति ऋषि और कृषि प्रधान रही है। समग्र प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करने तथा भाव से संबंध बनाए रखने के कारण ही हमारा विश्व बंधुत्व का संदेश भी रहा है। देश धर्म और समाज जब-जब नाना प्रकार की परेशानियों में रहा तब-तब संत महापुरुषों ने अपने कर्तृत्व द्वारा उससे राहत दिलाई एवं नई दिशा दी।
 
गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के द्वारा न केवल अपना ही जीवन कृतार्थ किया वरन्‌ समूची मानव जाति को श्रीराम के आदर्शों से जोड़ दिया। आज समूचे विश्व में श्रीराम का चरित्र उन लोगों के लिए आय बन चुका है जो समाज में मर्यादित जीवन का शंखनाद करना चाहते हैं।
 
संवद् 1554 को श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अवतरित गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति की रामभक्ति धारा को ऐसा प्रवाहित किया कि आज गोस्वामी जी राम भक्ति के पर्याय बन गए। गोस्वामी तुलसीदास की ही देन है जो आज भारत के कोने-कोने में रामलीलाओं का मंचन होता है। कई संत रामकथा के माध्यम से समाज को जागृत करने में सतत्‌ लगे हुए हैं। 
 
भगवान वाल्मीकि की अनूठी रचना श्रामायणश् को आधार मानकर गोस्वामी तुलसीदास ने लोक भाषा में रामकथा की मंदाकिनी इस प्रकार प्रवाहित की कि आज मानव जाति उस ज्ञान मंदाकिनी में गोते लगाकर धन्य हो रही है।
 
तुलसीदास का मत है कि इंसान का जैसा संग साथ होगा उसका आचरण व्यवहार तथा व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा, क्योंकि संगत का असर देर सवेर अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष, चेतन व अवचेतन मन एवं जीवन पर अवश्य पड़ता है। इसलिए हमें सोच-समझकर अपने मित्र बनाने चाहिए। सत्संग की महिमा अगोचर नहीं है अर्थात्‌ यह सर्वविदित है कि सत्संग के प्रभाव से कौआ कोयल बन जाता है तथा बगुला हंस। सत्संग का प्रभाव व्यापक है, इसकी महिमा किसी से छिपी नहीं है।
 
तुलसीदास का कथन है कि सत्संग संतों का संग किए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और सत्संग तभी मिलता है जब ईश्वर की कृपा होती है। यह तो आनंद व कल्याण का मुख्य हेतु है। साधन तो मात्र पुष्प की भांति है। संसार रूपी वृक्ष में यदि फल हैं तो वह सत्संग है। अन्य सभी साधन पुष्प की भांति निरर्थक हैं। फल से ही उदर पूर्ति संभव है न कि पुष्प से।
 
उपजहिं एक संग जग माहीं।
जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।
सुधा सुरा सम साधु असाधू।
जनक एक जग जलधि अगाधू।
 
संत और असंत दोनों ही इस संसार में एक साथ जन्म लेते हैं लेकिन कमल व जोंक की भांति दोनों के गुण भिन्न होते हैं। कमल व जोंक जल में ही उत्पन्न होते हैं लेकिन कमल का दर्शन परम सुखकारी होता है जबकि जोंक देह से चिपक जाए तो रक्त को सोखती है। उसी प्रकार संत इस संसार से उबारने वाले होते हैं और असंत कुमार्ग पर धकेलने वाले। संत जहां अमृत की धारा हैं तो असंत मदिरा की शाला हैं। जबकि दोनों ही संसार रूपी इस समुद्र में उत्पन्न होते हैं।
 
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पथ परिहरि बारि बिकार।
 
सृष्टि रचयिता विधाता ने इस जड़ चेतन की समूह रूपी सृष्टि का निर्माण गुण व दोषों से किया है। लेकिन संतरूपी हंस दोष जल का परित्याग कर गुणरूपी दुग्ध का ही पान किया करते हैं।
 
तुलसीदास ने अपने काव्य में बीस से अधिक रागों का प्रयोग किया है, जैसे आसावरी, जैती, बिलावल, केदारा, सोरठ, धनाश्री, कान्हरा, कल्याण, ललित, विभास, नट, तोड़ी, सारंग, सूहो, मलार, गौरी, मारू, भैरव, भैरवी, चंचरी, बसंत, रामकली, दंडक आदि। परंतु केदार, आसावरी, सोरठ कान्हरा, धनाश्री, बिलावल और जैती के प्रति उनकी विशेष रुचि रही है।
 
सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह पता चलता है कि तुलसी ने प्रत्येक भाव के उपयुक्त राग में अपने पदों की रक्षा की है। उन्होंने बड़ी सफलता से विभिन्न रागों के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त किया है। मारू, बिलावत, कान्हरा, धनाश्री में वीर भाव के पदों की रचना हुई हैं। श्रृंगार के पद विभास, सूहो विलास और तोड़ी से सृजित हैं।

 उपदेश संबंधी पदों की रचना भैरव, धनाश्री और भैरवी में की गई है। ललित, नट और सारंग में समर्पण संबंधी पद हैं।
 
संगीत के क्षेत्र में रसकल्पना काव्य के क्षेत्र में भिन्न होती है। काव्य का एक पद एक ही भाव की सृष्टि करता है किंतु संगीत के एक राग करुणा, उल्लास, निर्वेद आदि अनेक भावों की सृष्टि करने में सफल हो सकता है। 

तुलसीदास ने भी एक ही राग का प्रयोग अनेक स्थलों पर अनेक भावों को स्पष्ट करने के लिए किया है।

सबसे लोकप्रिय चौपाइयों का अर्थ जानिये

 हिन्दुओं के सबसे पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथो में से एक रामचरितमानस की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदासजी की जयंती 19 अगस्त 2026 बुधवार को मनाई जायेगी।  
श्री राम के परम भक्त और हनुमान के अनन्य उपासक तुलसीदास जी का जन्म श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। हर वर्ष इस तिथि को तुलसीदास जयंती मनाते हैं। 

 तुलसीदास जी हनुमान जी के इतने बड़े भक्त थे कि ऐसा कहा जाता है कि एक बार अकबर ने उन्हें जेल में डलवा दिया था तब उनको छुड़ाने के लिए बहुत सारे बंदरो ने जेल पर धावा बोल दिया था। ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान श्री राम ने तुलसीदास को दर्शन दिए थे। महान ग्रन्थ रामचरितमानस जिसमें भगवान् श्री राम के चरित्र का वर्णन है की रचना करने वाले तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की भी रचना की है।  

 इसके अलावा तुलसीदास ने बहुत सारी चौपाइयां लिखी हैं जिसमें ज्ञान समाहित है। इस महान संत और कवि का अधिकांश जीवन बनारस के घाटों पर बिता। इस बार की जयंती तुलसीदास की 526वीं जयंती होगी। इस जयंती पर हम तुलसीदास के कुछ बहुत लोकप्रिय चौपाइयों को यहां आपके लिए शेयर कर रहे हैं।

 1. दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण॥ 

 धर्म का अर्थ बताते हुए तुलसीदास जी कहते हैं की धर्म का मूल दया है, अधर्म का मूल अभिमान है। इसलिए जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक हर मनुष्य को कोशिश करनी चाहिए कि उसको कभी अभिमान ना हो। 

2. नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ 

कल्पतरु वो वृक्ष है जिससे जो कुछ मांगा जाए मिल जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में राम का नाम कल्पतरु के समान है। राम नाम का स्मरण करने से ही निकृष्ट तुलसीदास एक दिन तुलसी के समान पवित्र और प्रसिद्ध हो गए।
3. सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।। 

तुलसीदास जी कहते हैं कि जो भी हमारे शरण में आये उसकी रक्षा करना हमारा धर्म है। जो मनुष्य नुकसान होने के डर से शरणागत को शरण देने से मना कर देता है वह पापी है और उसको देखना भी पाप के सामान है। 

4. तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुं ओर। बसीकरण इक मंत्र हैं परिहरु बचन कठोर॥ 

तुलसीदासजी कहते हैं कि वाणी मीठी होनी चाहिए, कड़वा नहीं बोलना चाहिए। मीठे और मृदु वचन से किसी को भी वश में किया जा सकता है इसलिए कठोर वचन बोलने की जरुरत नहीं है।

5. मुखिया मुख सों चाहिए, खान पान को एक। पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥ 

किसी लीडर या मुखिया के बारे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जैसे एक मुंह जो खाता है उसका असर शरीर के सारे अंगों पर पड़ता है। मुखिया को भी विवेकशील होकर अपना काम करना चाहिए और सफलता मिलने पर सबको श्रेय देना चाहिए।
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