गणेश उत्सव विशेष: क्यों कहते हैं गणेश जी को मंगलमूर्ति ?
धर्म
20-Sep-26
आपके शरीर में ही छिपा है इसका उत्तर
छिंदवाडा
आज घर-घर में गणेश जी की स्थापना हो रही है। हम श्रद्धा से उन्हें गणपति, विनायक, अष्टविनायक, विघ्नहर्ता और मंगलमूर्ति जैसे अनेक नामों से पुकारते हैं। लेकिन क्या हमने कभी विचार किया है कि गणेश जी को “मंगलमूर्ति” क्यों कहा जाता है?
गणेश जी केवल मंदिर या मूर्ति में ही विराजमान नहीं हैं। उनका स्वरूप और संदेश हमारे शरीर, हमारी बुद्धि तथा हमारी इंद्रियों में भी उपस्थित है। यदि हम अपनी आँखों, कानों, नाक, मुख और बुद्धि का सही उपयोग करना सीख लें, तो हम भी अपने और दूसरों के जीवन में मंगल लाकर मंगलमूर्ति बन सकते हैं।
गण का अर्थ क्या है?
“गण”का अर्थ है- समूह और ईश का अर्थ है स्वामी
इस प्रकार गणेश का अर्थ हुआ समूह के स्वामी अथवा सभी को साथ लेकर चलने वाले देवता। गणेश जी हमें अपने शरीर, मन, बुद्धि और समस्त इंद्रियों के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पहचानी जाने वाली गणेश जी की मूर्ति अपने प्रत्येक अंग के माध्यम से मानव जीवन को एक महत्त्वपूर्ण संदेश देती है।
गणेश जी की मूर्ति हमें क्या सिखाती है?
1. छोटा मुख: कम और सोच-समझकर बोलिए
गणेश जी का छोटा मुख संदेश देता है कि मनुष्य को आवश्यकता से अधिक नहीं बोलना चाहिए। बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए कि उसके शब्द किसी को जोड़ेंगे या तोड़ेंगे। कम बोलना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसंयम और समझदारी का प्रतीक है।
2. बड़े कान: अधिक सुनिए, कम बोलिए
गणेश जी के बड़े कान हमें दूसरों की बात ध्यानपूर्वक सुनने की प्रेरणा देते हैं। बहुत-सी समस्याएं केवल इसलिए उत्पन्न होती हैं क्योंकि हम सामने वाले की बात समझने से पहले ही उत्तर देना शुरू कर देते हैं। जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक सुनना सीख लेता है, वह परिवार और समाज की अनेक समस्याओं का समाधान कर सकता है।
3. बड़ा मस्तक: भावनाओं के साथ बुद्धि का भी उपयोग कीजिए
गणेश जी का विशाल मस्तक विवेक, ज्ञान और दूरदर्शिता का प्रतीक है। जीवन के निर्णय केवल भावनाओं में बहकर नहीं लेने चाहिए। भावना के साथ बुद्धि और विवेक का संतुलन आवश्यक है। सही समय पर सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति अपने जीवन के अनेक विघ्न स्वयं दूर कर सकता है।
4. बड़ा पेट: बातों को संभालकर रखना सीखिए
गणेश जी का बड़ा पेट हमें सिखाता है कि प्रत्येक बात हर व्यक्ति को बताना आवश्यक नहीं है। किसकी बात, कब और किससे कहनी है, इसका विवेक होना चाहिए। किसी की गोपनीय बात को सुरक्षित रखना भी विश्वास, संबंध और अच्छे चरित्र की पहचान है।
मनुष्य स्वयं मंगलमूर्ति कैसे बन सकता है?
जो व्यक्ति कम और मधुर बोलता है, दूसरों की बात ध्यान से सुनता है, अपनी आंखों से अच्छाई देखता है, बुद्धि और विवेक से निर्णय लेता है, किसी की गोपनीय बात को सुरक्षित रखता है, तथा अपने कारण किसी के जीवन में दुःख नहीं, सुख उत्पन्न करता है, वह स्वयं भी मंगलमूर्ति बन सकता है। मंगलमूर्ति होने का अर्थ केवल शुभ दिखाई देना नहीं, बल्कि अपने विचारों, वाणी और कर्मों से दूसरों के जीवन में मंगल लाना है।
गणेश जी को विघ्नहर्ता क्यों कहते हैं?
हम प्रार्थना करते हैं कि गणेश जी हमारे जीवन के सभी विघ्न दूर करें। लेकिन कलियुग पुराण का मानवीय संदेश हमें एक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है, क्या हम किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन के विघ्नहर्ता बन सकते हैं?
यदि हमारी बुद्धि, सामर्थ्य, शिक्षा, संपर्क या सेवा से किसी व्यक्ति की परेशानी दूर हो सकती है, तो हमें उसकी सहायता अवश्य करनी चाहिए। हर इंसान के भीतर किसी न किसी का विघ्नहर्ता बनने की क्षमता मौजूद है। आवश्यकता केवल परमार्थ की भावना की है। हमारा विचार यह नहीं होना चाहिए-
“यह व्यक्ति मेरे क्या काम आएगा?” बल्कि हमें सोचना चाहिए “मैं इस व्यक्ति के क्या काम आ सकता हूँ?” यही गणेश जी की वास्तविक पूजा है।
गणेश स्थापना का वास्तविक संकल्प
आज जब हम अपने घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की स्थापना करें, तब एक संकल्प अपने भीतर भी करें मैं अपने कानों से अधिक सुनूंगा, मुख से कम और मधुर बोलूंगा, आंखों से अच्छाई देखूंगा, बुद्धि से उचित निर्णय लूंगा और अपने कर्मों से किसी के जीवन का विघ्न दूर करूंगा।
जिस दिन मनुष्य अपनी इंद्रियों, बुद्धि और वाणी का सही उपयोग करना सीख जाएगा, उस दिन गणेश जी केवल उसके घर में नहीं, बल्कि उसके आचरण में भी स्थापित हो जाएंगे। अपने भीतर के गणेश को जागृत कीजिए। स्वयं मंगलमूर्ति बनिए और किसी के जीवन के विघ्नहर्ता बनिए।