भीतर बैठे हुए राम को जगाकर बुराई रूपी रावण का अंत करें
लेख
20-Oct-26
लेखक: अनिल ताम्रकार (सेवानिवृत्त शिक्षक)
धर्म समझदारों की आँखें खोल देता है और मूर्खों की बंद कर देता है ..... धर्म जब आँखें खोल देता है तो मनुष्य दानव से मानव बन जाता है ....और डाकू रत्नाकर से महर्षि बाल्मीकि बनकर रामायण जैसा महाकाव्य रच देता है.....और जब बंद कर देता है तो मनुष्य धर्मांध होकर घृणा का पुजारी बन जाता है .... दुनिया में बढ़ता हुआ आतंकवाद इसी का उदाहरण है....धर्म के नाम पर पाखंड रचने वाले, धर्म के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाने वाले, धर्म के नाम पर मनुष्यों में घृणा का बीज बोने वाले ऐसे ही मूर्खों की श्रेणी में आते हैं...
सनातन धर्म के सभी पर्वों का उद्देश्य व आधार एक ऐसे समाज का निर्माण करना रहा है... जहां बुराइयों का कोई स्थान न हो....लगभग सभी पर्वों का संदेश प्रेम,करुणा,सत्य पर ही केंद्रित रहा है...ऐसा ही पर्व विजयादशमी भी है.... असत्य पर सत्य की,अधर्म पर धर्म की, बुराइयों पर अच्छाई की,पाप पर पुण्य की, दुराचार पर सदाचार की,दानवता पर मानवता की विजय का पर्व है यह विजयादशमी....!शारदीय नवरात्रों में मां की आराधना की जाती है... सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जहां नारी की पूजा की जाती है... वहां देवता रमण करते हैं .....नारी को शक्ति भी माना जाता है ... शास्त्रों के अनुसार मां जगदम्बे ने भी संसार को अधर्म व असत्य से मुक्त करने के लिए रक्तबीज, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ जैसे अत्याचारी दानवों का वध किया...व संसार में धर्म की स्थापना की.....दूसरी कथा के अनुसार श्री राम की अत्याचारी रावण पर विजय को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है..... हमारे धर्मशास्त्रों में जहां दानव को मानव में बदलने की शक्ति है... वहीं इसका दुरुपयोग मानव को दानव भी बना सकता है... इसलिए धर्म को सही अर्थों में समझना आवश्यक है ...हम उन धर्मशास्त्रों के संदेशों व उद्देश्यों को समझें व उसके अनुसार हमारा आचरण हो... लेकिन इसके विपरीत हमारे समाज की दशा कुछ अलग ही कहानी बयां करती है...नारी उत्पीड़न की निरंतर बढ़ती घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती हैं...दुष्कर्म की बढ़ती घटनाएं हमारे समाज के विकृत चेहरे को उजागर करती हैं ....वहीं समाज में राम के दर्शन दुर्लभ हैं.... कमोवेश हर मनुष्य के भीतर किसी-न-किसी रूप में रावण जिंदा है.... वहीं महिलाओं में भी हमें कई बार शूर्पणखाओं,पूतनाओं आदि की झलक दिख जाती है .... पुरुष और महिला दोनों ही इस समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं....गाड़ी सही ढंग से तभी चल सकती है ...जब उसके दोनों पहियों में कोई खराबी न हो... कोई असंतुलन न हो....ऐसा न होने पर हमेशा दुर्घटना की संभावना बनी रहती है व गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.... एक महत्वपूर्ण रहस्य यह भी है कि रावण सिर्फ पुरुष के अहंकार का ही प्रतीक नहीं है .....रावण को सिर्फ एक व्यक्ति नहीं.... बल्कि एक बुराई के नजरिए से भी समझने की आवश्यकता है ...समाज की सभी समस्याओं के मूल में सबसे बड़ी बुराई अहंकार ही है.....इसी से सारी समस्याओं की उत्पत्ति होती है.....रावण के दस सिर दस बुराइयों के प्रतीक हैं....जिनका अंत राम ही कर सकते हैं....राम और रावण दोनों ही कहीं और नहीं बल्कि हर मनुष्य के भीतर ही मौजूद हैं..... लेकिन हमने अपने धर्मग्रंथों को सिर्फ एक घटना के नजरिए से ही देखा....उसके वास्तविक संदेश व उद्देश्य को समझने का कभी प्रयास नहीं किया.....इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारा व्यक्तित्व दोहरा निर्मित हो गया....एक....जो समाज को हम दिखाना चाहते हैं ....और दूसरा वह.....जो सिर्फ हमें ही पता होता है....वह समाज को अक्सर दिखाई नहीं देता...... अहंकार रूपी रावण हमारे समाज में अपनी गहरी पैठ बना चुका है..... अहंकार भी दो तरह का होता है ....एक स्थूल अहंकार जो चीख-चीखकर स्वयं अपना परिचय दे देता है ....जो किसी से छिपता नहीं है....प्रकट हो जाता है....रावण का अहंकार स्थूल ही था....जो सभी को दिखाईं देता था....दूसरा होता है सूक्ष्म अहंकार ....यह आमतौर पर प्रकट रूप से दिखाई तो नहीं देता... लेकिन होता अवश्य है....यह परमाणु की तरह घातक होता है.....यह अहंकार अक्सर छद्म रूप धारण किए हुए रहता है..... वर्तमान में धर्म को सबसे अधिक खतरा इसी से है..... तथाकथित धर्म के ठेकेदारों में यह अधिक पाया जाता है.... धर्म को सबसे अधिक क्षति ऐसे ही लोगों ने पहुंचाई है और अभी तक पहुंचा रहे हैं.... रामराज्य में राजनीति में धर्म हुआ करता था.... लेकिन अब धर्म में राजनीति हुआ करती है...अब तो यह आलम है कि यदि कोई पत्थर उछाला जाए तो वह किसी-न-किसी रावण को ही लगेगा.... भ्रष्टाचार व पाखंड रूपी रावण समाज को बुरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले चुका है... समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है.,... सदियों से रावण के सिर्फ पुतले का ही दहन किया जा रहा है ....जिसकी ऊंचाई लगातार बढ़ते जा रही है.... साधुवेशधारी रावणों की संख्या निरंतर बढ़ते जा रही है.....रावण कम से कम पाखंडी तो नहीं था.... लेकिन आज के मानव ने तो रावण को भी पीछे छोड़ दिया है....रावण के सिर्फ दस ही चेहरे थे....जो बाहर से ही दिखाई दे जाते थे..... लेकिन आज के रावणों के कई चेहरे हैं ...जो बाहर से दिखाई नहीं देते....लोग राम को तो मानते हैं .... लेकिन राम की नहीं मानते..... धर्म समझदारों की आँखें खोल देता है और मूर्खों की बंद कर देता है ..... धर्म जब आँखें खोल देता है तो मनुष्य दानव से मानव बन जाता है ....और डाकू रत्नाकर से महर्षि बाल्मीकि बनकर रामायण जैसा महाकाव्य रच देता है.....और जब बंद कर देता है तो मनुष्य धर्मांध होकर घृणा का पुजारी बन जाता है .... दुनिया में बढ़ता हुआ आतंकवाद इसी का उदाहरण है....धर्म के नाम पर पाखंड रचने वाले, धर्म के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाने वाले, धर्म के नाम पर मनुष्यों में घृणा का बीज बोने वाले ऐसे ही मूर्खों की श्रेणी में आते हैं... शारदीय नवरात्रों के दौरान देश विदेश में रामलीला का आयोजन किया जाता है .... लेकिन इसका प्रभाव समाज में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता....यदि होता तो समाज का इतना नैतिक और चारित्रिक पतन कभी नहीं होता.... हमें दूसरों में तो रावण दिखाई देता है..... लेकिन अपने ही भीतर का रावण हमें दिखाई नहीं देता...या फिर शायद उसे देखना व पहचानना ही नहीं चाहते.... किसी भी रोग का सफल इलाज तभी संभव होता है ...जब रोग की सही पहचान की जाए.....!बिना इसके इलाज असंभव है....!देवी की आराधना-भक्ति व राम की आराधना-भक्ति का यह विजयादशमी का पर्व तभी सार्थक होगा जब देश में महिलाएं सुरक्षित होंगी... उन्हें देवी नहीं तो कम से कम इंसान तो समझा जाएगा....जब कोई भी मासूम बच्ची,बालिका या महिला दुष्कर्म व अत्याचार का शिकार नहीं होगी... जहां कभी कोई साधुवेशधारी रावण ,सीता का हरण नहीं करेगा.... समाज में राम के आदर्शों को अपनाया जाएगा....और समाज में छिपे हुए रावणों,महिषासुरों, शुंभ-निशुंभों,चंड-मुंडों व रक्तबीजों को पहचानकर उनका सामाजिक तिरस्कार व बहिष्कार किया जाएगा.... समाज में जिस तरह के लोगों का महिमा मंडन व सम्मान किया जाता है.... समाज वैसा ही बनता है.....यदि हम बुरे लोगों को महिमा मंडित व सम्मानित करेंगे तो समाज भी वैसा ही बनेगा....और यदि अच्छे चरित्र वाले लोगों का सम्मान करेंगे ....तो समाज भी अच्छा बनेगा....अब यह पूरी तरह से हम पर ही निर्भर है कि आखिर हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं....! दूसरों की जय से पहले हमें खुद की बुराइयों पर विजय प्राप्त करनी होगी ....अपने भीतर छिपे हुए रावण को पहचानना होगा और भीतर बैठे हुए राम को जगाकर उस बुराई रूपी रावण का अंत करना होगा...!!तभी हमें विजयादशमी पर्व मनाने नैतिक अधिकार प्राप्त होगा...!