नागद्वारी में इस साल लगभग 6 लाख श्रद्धालु पहुंचे
छिंदवाड़ा
29-Jul-25
नागपुर सहित महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में आते है श्रद्धालु
छिंदवाड़ा
सतपुड़ा के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच नागलोक है जिसे नागद्वार भी कहा जाता है। भगवान शिव के भक्त हर साल नागद्वार के दर्शन और पूजन के लिए यहां आते हैं। पचमढ़ी के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच इस यात्रा को नागद्वारी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है। यहां एक प्राचीन गुफा है जो पद्यशेष महाराज का निवास मानी जाती है। यहां नागपुर और महाराष्ट्र के लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। इस वर्ष यहां आने वाले श्रद्धालुओं का आंकड़ा लगभग 6 लाख बताया जा रहा है। छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिले से भी शिवभक्त बड़ी संख्या में नागद्वारी मेले में जाकर नाग देवता की पूजा करते हैं। नागपंचमी का दिन यहां दर्शन का आखिरी दिन होता है। अब एक वर्ष के लिए यह स्थान बंद हो जाएगा। नागद्वार जाने वाले भक्तों के लिए यात्रा से आने के बाद ‘कढ़ाई ’ करना अनिवार्य होता है। नहाकर गीले कपड़ों में यह धार्मिक अनुष्ठान होता है जिसमें भगवान शंकर के साथ शेषनाग की आराधना की जाती है और उसके बाद प्रसाद सभी भक्तों मे ंबांटा जाता है।

पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किए नागचंद्रेश्वर के दर्शन
उज्जैन में श्री महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट रात 12 बजे खोले गए। महानिर्वाणी अखाड़ा के महंत विनीत गिरी महाराज ने त्रिकाल पूजन किया इसके बाद श्रद्धालुओं के पूजा अर्चन के लिए मंदिर के पट खोले गए। श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट हर साल सिर्फ नागपंचमी के दिन 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। रात 12 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाएंगे। बताया जा रहा है शाम 7 बजे तक पांच लाख से अधिक श्रद्धालु मंदिर में श्री नागचंद्रेश्वर देव के दर्शन कर चुके थे।
क्या है मंदिर का इतिहास?
श्री नागचंद्रेश्वर प्रतिमा जिसमें शिव नाग शैया पर लेटे हुए है और पार्वती व भगवान गणेश बैठी हुई मुद्रा में है 11 शताब्दी की बताई जाती है। प्रतिमा में सप्तमुखी नाग देवता, नंदी और सिंह भी है। शिव के गले और भुजाओं में नाग लिपटे हैं। श्री महाकेश्वर मंदिर की सरंचना तीन खंडों में है। सबसे नीचे महाकालेश्वर का गर्भगृह, दूसरे खंड में आंेकारेश्वर मंदिर जबकि तीसरे और शीर्ष खंड में श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर है। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण परमार वंश के राजा बोजराजा ने 1050 ईसवी के आसपास कराया था। 1732 ईस्वी में सिंधिया राजघराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धर करवाया।