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साख बचाने और बनाने के लिए युवा नेताओं की जद्दोजहद

साख बचाने और बनाने के लिए युवा नेताओं की जद्दोजहद
लेख
19-Aug-25
नकुलनाथ/बंटी विवेक साहू 

छिंदवाड़ा

देश की आजादी से अब तक जिले की राजनीति दो दलों कांग्रेस और भाजपा नेताओं के इर्दगिर्द ही चली आ रही है। जिले की जनता नेे बहुत लंबा समय कांग्रेस के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना के साथ जिया है इसी का परिणाम था कि लंबे समय तक कांग्रेस ने छिंदवाड़ा की राजनीति में एकतरफा राज किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री, सीएम व वर्तमान विधायक कमलनाथ ने लगभग साढ़े तीन दशक तक छिंदवाड़ा में एकछत्र राजनीति की है। अपनी राजनीतिक विरासत को वे अपने पुत्र को सौंपना चाहते हैं लेकिन छिंदवाड़ा की जनता के मन में क्या है यह उन्हें समझ नहीं आ रहा है। कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ को राजनीतिक विरासत सौंपने की हलचलों ने छिंदवाड़ा की राजनीति को नया मोड़ दिया है। इसके पहले भाजपा ने जितने भी प्रयास किए हैं उनमें से उसे मात्र दो बार ही सफलता मिली है। भाजपा की पहली सफलता को कमलनाथ ने तुरंत ही अपने प्रभाव से कम कर दिया लेकिन अब उम्र के साथ-साथ जनता पर उनकी ढीली होती पकड़ और विरासत सौंपने की राजनीति ने भाजपा के लिए नए अवसर पैदा कर दिए हैं।

भले ही कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ को छिंदवाड़ा की राजनीति में पैर जमाने के लिए  बिसात बिछा रहे हैं लेकिन पिछले चुनाव में विरासत सौंपने को लेकर जो बगावत के सुर फुटे उसने कुछ और ही संकेत दिए हैं। छिंदवाड़ा की राजनीति इस समय कुछ नया मांग रही है। ये नई सोच भी हो सकती है, नया चेहरा भी हो सकता है और नया राजनीतिक कल्चर भी हो सकता है।

आज का युवा परंपरागत राजनीति में विश्वास नहीं रखता उसे अपना भविष्य जिस नेतृत्व में दिखाई देगा वह उसी को चुनेगा। नकुलनाथ हो या फिर बंटी विवेक साहू दोनों युवा नेता छिंदवाड़ा की राजनीति में स्वयं के लिए मजबूत जमीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस के युवा नेता नकुलनाथ किसान, यूरिया और आदिवासी को केंद्र में रखकर राजनीति में पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं तो वहीं बंटी विवेक साहू स्थानीय होने का पूरा फायदा उठाते दिखाई दे रहे हैं। नकुलनाथ हर दूसरे माह छिंदवाड़ा आकर अपनी उपस्थिति का अहसास करा रहे हैं तो उधर बंटी विवेक साहू भी अपना अधिकांश समय छिंदवाड़ा में अपनी जड़ें मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों नेताओं की जमीनी पकड़ की परीक्षा 2026-27 में होने वाले चुनावों से शुरू हो जाएगी। नगर पालिका-नगर निगम, नगर पंचायत, जिला पंचायत, विधान सभा और फिर लोकसभा। फिलहाल नकुलनाथ के आगमन से जिले की राजनीति गर्मा गई है। उनके आंदोलन से किसान और आदिवासी कितने प्रभावित होकर पुनः कांग्रेस से जुड़ते है यह समय के साथ पता चलेगा।
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