निजी हाथों में स्वास्थ्य सेवाएं तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य शिविरों की नौटंकी
राजनीति
23-Sep-26
कांग्रेस ने कसा तंज, सकारी अस्पतालों की तबीयत खराब
स्वास्थ्य शिविर राजनीतिक प्रचार का बना माध्यम

छिन्दवाड़ा
भाजपा सांसद के द्वारा आयोजित किए स्वास्थ्य शिविर को लेकर कांग्रेस ने तंज कसते हुए इसे राजनीतिक प्रचार का माध्यम बताया है। जिला कांग्रेस प्रवक्ता राजेश पाटिल ने कहा कि मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध जिला अस्पताल और जिले के सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को इलाज की दरकार है। यहां पहुंचने वाले मरीजों को इलाज तब मुहैया होता है, जब स्वास्थ्य उपकरणों का सुधार कार्य हो जाए और वह तब संभव है, जब स्वास्थ्य सेवाओं को परमार्थ और परोपकार के कार्य से जोड़कर देखा जाए। अगर इसे प्रचार और राजनीतिक लाभ के नजरिये से भुनाने का प्रयास किया जा रहा है तो मरीजों के इलाज का आंकड़ा स्वास्थ्य शिविरों से निकलकर आता है ना कि शासकीय अस्पतालों से। शासकीय स्वास्थ्य सेवाएं बदत्तर हो चुकी है या फिर भाजपा की सरकार ने सोची समझी साजिश के तहत कर दी है ताकि इन्हें निजी हाथों में सौंपकर मोटा मुनाफा काटा जाए।
आम जनता के टैक्स की राशि से बनकर तैयार हुए 4000 करोड़ के 09 मेडिकल कॉलेजों को प्रदेश की भाजपा सरकार निजी हाथों में सौंप रही है। इसके अलावा प्रदेश के 18 सीएचसी को भी पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनशिप) पर देने की तैयारी पूर्ण हो चुकी। यानि भाजपा की सरकार में अब गरीब, मध्यम, आम और खास सभी लोगों को इलाज के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी। शासकीय अस्पतालों में निरूशुल्क इलाज, जिला अस्पताल, सामुदायिक व प्राथमिक केन्द्रों का निर्माण कांग्रेस सरकार के इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा। एक ओर सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं मिल रहा है, जिस पर भाजपा सरकार चुप्पी साधे हुए हैं वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य शिविर जैसे पवित्र कार्य को भाजपा ने राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना लिया है। जनता शासकीय अस्पतालों में समुचित उपचार चाहती है।
राजेश पाटिल ने जारी बयान में आगे कहा कि एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपे जाने का विरोध करते हुए कहा कि छिन्दवाड़ा जिले में स्वास्थ्य शिविर लगाए जाने की नौटंकी पूरे जोरशोर से जारी है। आखिर भाजपा जनसेवा कर रही है या स्वास्थ्य सेवाओं जैसे पुण्यत कार्य पर राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण में जुटी है। लचर और घटिया स्वास्थ्य सेवाओं के चलते जनता को शासकीय अस्पतालों में समुचित उपचार नहीं मिल रहा है। अनेकों जांच नहीं हो रही, कभी सीटी स्केन तो कभी सोनोग्राफी मशीन बंद हो जाती है। ग्रामीण व आदिवासी अंचल से आने वाले गरीब व मजदूर वर्ग को निजी संस्थानों से जांच करानी पड़ रही जिससे उन्हें अधिक राशि खर्च करनी पड़ती है। जिम्मेदारों का इस ओर ध्यान नहीं है, ध्यान केवल राजनीतिक रोटियां सेंकने तक सीमित है।