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दूध बेचकर प्रतिदिन 18 से 20 हजार कमा रहे भगवान दास

दूध बेचकर प्रतिदिन 18 से 20 हजार कमा रहे भगवान दास
कृषि जगत
07-Oct-26

डॉ.भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना से पशुपालन बना लाभ का व्यवसाय

छिन्दवाडा अपडेट

अमरवाड़ा विकासखंड के ग्राम जमुनिया भूरा निवासी भगवानदास सूर्यवंशी के लिए पशुपालन कभी परिवार के भरण-पोषण का एक साधन मात्र था। सीमित संसाधनों और अवर्णित नस्ल के पशुओं के कारण दुग्ध उत्पादन कम था। बड़े स्तर पर पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय शुरू करने की इच्छा थी, लेकिन आर्थिक संसाधनों की कमी राह में बड़ी बाधा बनी हुई थी। आज वही भगवानदास सूर्यवंशी पशुपालन को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित तरीके से अपनाकर न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं, बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना ने उनके सपने को नई दिशा दी और पशुपालन को एक लाभकारी व्यवसाय में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सीमित संसाधनों से बड़े सपने तक का सफ़र

34 वर्षीय श्री भगवानदास सूर्यवंशी, माध्यमिक शिक्षा प्राप्त हैं। योजना से पहले वे सामान्य रूप से अवर्णित नस्ल के पशुओं का पालन कर जीवन-यापन कर रहे थे। पशुओं की उत्पादकता कम होने के कारण प्रतिदिन केवल 20 से 25 लीटर दूध का उत्पादन होता था। इससे आय भी सीमित थी और बड़े पैमाने पर डेयरी व्यवसाय शुरू करना संभव नहीं हो पा रहा था। श्री भगवानदास बताते हैं कि उनके मन में हमेशा से पशुपालन को बड़े व्यवसाय के रूप में विकसित करने की इच्छा थी, लेकिन इसके लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध नहीं थी। ऐसे समय में विभागीय योजना की जानकारी उनके लिए उम्मीद की नई किरण बनकर आई।

योजना ने बदली दिशा 

श्री भगवानदास को पशु चिकित्सालय अमरवाड़ा के विकासखंड अधिकारी डॉ. मयंक परवारी के माध्यम से डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने योजना के अंतर्गत आवेदन की प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी की। उप संचालक, पशुपालन एवं डेयरी विभाग छिंदवाड़ा के मार्गदर्शन में उनका प्रकरण तैयार हुआ और मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक, अमरवाड़ा से ऋण स्वीकृत हुआ। दिनांक 24 मार्च 2026 को बैंक द्वारा 33.60 लाख रुपये का ऋण स्वीकृति पत्र जारी किया गया। इसके बाद प्रथम चरण में 8.80 लाख रुपये तथा आगे 9 लाख रुपये की ऋण राशि जारी की गई। योजना के तहत कुल परियोजना लागत 42 लाख रुपये निर्धारित की गई।

पशु शेड से शुरू हुआ वैज्ञानिक पशुपालन का सफर

प्राप्त वित्तीय सहायता से श्री भगवानदास ने लगभग 2500 वर्गफीट क्षेत्र में पशु शेड का निर्माण कराया और 17 दुधारू भैंसवंशीय पशु खरीदे। उन्होंने पशुपालन को केवल पारंपरिक तरीके से करने के बजाय वैज्ञानिक पद्धति अपनाने पर जोर दिया। पशुपालन विभाग के सहयोग से उन्हें पशु चिकित्सा महाविद्यालय जबलपुर में प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया। प्रशिक्षण के माध्यम से पशुओं की देखभाल, पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन और दुग्ध उत्पादन को बेहतर बनाने की वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त हुई।

20 लीटर से 280 लीटर तक पहुंचा दुग्ध उत्पादन

योजना का सबसे बड़ा असर श्री भगवानदास के डेयरी व्यवसाय पर दिखाई दिया। जहां पहले उनके यहां प्रतिदिन महज 20दृ25 लीटर दूध का उत्पादन होता था, वहीं अब उत्पादन बढ़कर लगभग 250 से 280 लीटर प्रतिदिन हो गया है। दुग्ध उत्पादन में आए इस बड़े बदलाव ने उनकी आय और परिवार की आर्थिक स्थिति को नई मजबूती दी है। वर्तमान में श्री भगवानदास को दुग्ध विक्रय से लगभग 18 से 20 हजार रुपये प्रतिदिन की आमदनी प्राप्त हो रही है।

पशुपालन बना परिवार की खुशियों का आधार

डेयरी व्यवसाय के विस्तार का लाभ केवल श्री भगवानदास तक सीमित नहीं रहा। पशुपालन से उनके परिवार के सदस्यों को रोजगार मिला और साथ ही वे दो अन्य व्यक्तियों को भी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। बढ़ती आय से परिवार की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। अब पशुपालन उनके लिए केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और लाभकारी व्यवसाय बन चुका है। जिससे उनके परिवार में खुशहाली आयी है।

आगे दुग्ध प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने की है योजना

डेयरी व्यवसाय में सफलता मिलने के बाद श्री भगवानदास ने अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। भविष्य में वे दुग्ध प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं, ताकि दूध से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर आय के नए अवसर विकसित किए जा सकें। श्री भगवानदास कहते हैं कि विभागीय योजना से उन्हें अपने व्यवसाय को विस्तार देने का अवसर मिला। वे स्वयं योजना से संतुष्ट हैं और क्षेत्र के अन्य पशुपालकों को भी सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर पशुपालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना के माध्यम से आया यह बदलाव केवल दूध के उत्पादन में वृद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि यह आत्मविश्वास, रोजगार, आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की कहानी है। भगवानदास सूर्यवंशी ने साबित कर दिया कि वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन किया जाए तो इसे एक सफल और सम्मानजनक व्यवसाय बनाया जा सकता है।
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