पितृपक्ष विशेष : स्मृति, श्रद्धा और कृतज्ञता का पवित्र पर्व
धर्म
25-Sep-26
26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक
छिंदवाड़ा अपडेट
फिर एक बार वह पवित्र समय हमारे द्वार पर दस्तक दे रहा है, जब घर के आंगन में केवल दीपक नहीं जलते, बल्कि स्मृतियों के दीप भी प्रज्वलित होते हैं। जब हम अपने उन पूर्वजों को याद करते हैं, जिनके त्याग, तप, संघर्ष और संस्कारों की नींव पर आज हमारा जीवन खड़ा है। यही है पितृपक्ष—श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता का पर्व।
वर्ष 2026 में 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा और मुख्य पितृपक्ष की प्रथम तिथि 27 सितंबर से प्रारम्भ होगी। यह क्रम 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा।
सनातन परंपरा में मनुष्य केवल अपने वर्तमान से नहीं बना है। उसके पीछे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अनगिनत ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों की एक पूरी परंपरा होती है। उन्होंने हमें केवल रक्त नहीं दिया, बल्कि नाम, संस्कार, संस्कृति, परिवार और जीवन जीने की दृष्टि भी दी। इसीलिए हमारे शास्त्रों ने पितरों के प्रति कृतज्ञता को धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना है।
तैत्तिरीय उपनिषद् में स्पष्ट आदेश मिलता है— “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।” अर्थात माता और पिता को देवतुल्य मानो। यह भावना केवल जीवित माता-पिता तक सीमित नहीं है। उनके देहावसान के बाद भी उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता समाप्त नहीं होती। श्राद्ध उसी निरंतर संबंध की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है।
मनुस्मृति में भी पितरों के लिए श्राद्ध और सम्मान की परंपरा को गृहस्थ धर्म का महत्वपूर्ण भाग माना गया है। वहीं महाभारत के अनुशासन पर्व में भी पितरों के सम्मान, दान और श्राद्ध की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। ‘श्राद्ध’ शब्द ही अपने भीतर इसका रहस्य समेटे हुए है—श्रद्धा से किया गया कर्म। केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मन में प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता का भाव होना आवश्यक है।
पितृपक्ष हमें एक बहुत सुंदर बात सिखाता है—जिस वृक्ष की छाया में हम बैठे हैं, उसकी जड़ों को भूलना नहीं चाहिए। आज हम आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं। हमारे घर बड़े हो गए, सुविधाएं बढ़ गईं, तकनीक ने जीवन बदल दिया। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी जड़ों से ही दूर हो जाएं। पितृपक्ष हमें रोककर पूछता है— “तुम्हें यह जीवन किसने दिया? तुम्हारा अस्तित्व किन लोगों के त्याग का परिणाम है?”
जब हम तर्पण करते हैं, जल अर्पित करते हैं, पिंडदान करते हैं, ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन कराते हैं और अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, तब वास्तव में हम अपने भीतर कृतज्ञता का संस्कार जागृत करते हैं।
गरुड़ पुराण की परंपरा में भी मृत्यु के बाद के संस्कारों तथा पितरों के प्रति कर्तव्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। सनातन दृष्टि में मृत्यु अंत नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा का एक पड़ाव है इसलिए चली गई आत्माओं के लिए शांति और सद्गति की कामना की जाती है।
पितृपक्ष का सबसे सुंदर संदेश यह है कि पूर्वजों को केवल श्राद्ध के दिन याद न करें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। यदि पिता ईमानदार थे—तो ईमानदारी अपनाइए। यदि माता ने परिवार को जोड़कर रखा—तो परिवार को जोड़िए। यदि दादा ने कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष किया—तो विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत मत हारिए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कहा भी गया है—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” हमारी जन्मभूमि और हमारी जन्मदात्री परंपरा हमारे अस्तित्व का आधार हैं। उसी परंपरा को आगे बढ़ाना हमारा उत्तरदायित्व है। आइए, इस पितृपक्ष अपने घर को केवल पूजा की वस्तुओं से नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा, सदाचार और संस्कारों से सजाएं जिनके कारण हमारा अस्तित्व है, उन्हें प्रेमपूर्वक स्मरण करें।
आइए सच्चे मन से कहें— “हे हमारे पूज्य पितरों! आप जहां कहीं भी हैं, आपको हमारा कोटि-कोटि नमन आपने हमें जो जीवन, संस्कार और विरासत दी, उसके लिए हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे।हमारे जीवन के सद्कर्म आपके चरणों में श्रद्धा-सुमन बनकर अर्पित हों।" हमारे परिवार पर आपका आशीर्वाद बना रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों, संस्कारों और सनातन परंपरा से जुड़ी रहें।
ॐ पितृभ्यो नमः।
ॐ पितृदेवताभ्यो नमः।
सर्वे पितरः तृप्यन्तु।
श्रद्धा से स्मरण करें, प्रेम से तर्पण करें और संस्कारों से अपने पितरों का नाम रोशन करें।