अल्प वर्षा में सही फसल एवं किस्म के चयन की दी जानकारी
कृषि जगत
30-Sep-26
जिला पंचायत सभागार में आत्मा योजना अंतर्गत कृषक वैज्ञानिक परिचर्चा आयोजित

छिन्दवाड़ा अपडेट
उन्नतशील किसानों को मौसम की परिस्थितियों के अनुरूप फसल एवं किस्म का चयन करने तथा अल्प वर्षा की स्थिति से निपटने के लिए आधुनिक कृषि जानकारी देने के उद्देश्य से आत्मा योजना अंतर्गत गत दिवस कृषक वैज्ञानिक परिचर्चा का आयोजन जिला पंचायत सभागार छिंदवाड़ा में किया गया। परिचर्चा में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को अल्प वर्षा की स्थिति में फसल प्रबंधन, उपयुक्त फसल एवं किस्म का चयन, उपलब्ध नमी का समुचित उपयोग तथा उत्पादन बढ़ाने की तकनीकों के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्तमान परिस्थितियों में किसान अपनी भूमि, उपलब्ध नमी एवं स्थानीय मौसम को ध्यान में रखते हुए फसल एवं किस्म का सही चुनाव करें, जिससे कम वर्षा की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
कृषि विज्ञान केंद्र चंदनगांव की वैज्ञानिक डॉ. सरिता सिंह ने बताया कि किसान गेहूं की कम पानी में उत्पादन देने वाली किस्में जैसे एचआई 1544, एचआई 1650, जेडब्ल्यू 3288, जेडब्ल्यू 3020, जेडब्ल्यू 1202, जेडब्ल्यू 3211 एवं लोकवन, जेडब्ल्यू 273 आदि तथा चने की जे.जी. 14, जे.जी. 16, आरबीजी 202 आदि किस्मों का चयन कर सकते हैं। सरसों की समस्त किस्मों की बोनी भी कम पानी में अच्छी उत्पादकता देती है। किसान जीरो टिलेज पद्धति से मक्का फसल की तुड़ाई के तत्काल बाद बोनी कर सकते हैं।
उतेरा पद्धति से मक्का फसल की कटाई के 15 दिवस पूर्व ही सरसों की बोनी करने से सरसों का उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है। समय पर बोनी होने से रोग एवं कीटों का प्रकोप भी कम रहता है और फसल सुरक्षित रहती है। इस पद्धति में किसी प्रकार की अतिरिक्त लागत भी नहीं आती। आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र चंदनगांव, छिंदवाड़ा की वैज्ञानिक डॉ. शिखा शर्मा ने आगामी रबी फसलों के लिए बीज उपचार कर बोनी करने की सलाह दी। उन्होंने रबी फसलों में लगने वाले कीट एवं व्याधियों पर भी विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम में उप संचालक कृषि मोरिस नाथ ने किसानों को चना एवं सरसों के पर्याप्त बीज भंडारण की जानकारी देते हुए प्रमाणित एवं अनुशंसित किस्मों के बीज का उपयोग करने की सलाह दी। साथ ही ई-विकास प्रणाली अंतर्गत उर्वरकों के अग्रिम उठाव की सलाह दी गई। किसानों को रबी सीजन में पंजीकृत लाइसेंसी से ही आदान सामग्री क्रय करने की सलाह भी दी गई।
परियोजना संचालक आत्मा धीरज कुमार ठाकुर ने कहा कि प्राकृतिक खेती में मिश्रित एवं अंतरवर्ती फसल पद्धति, फसल विविधीकरण तथा स्थानीय एवं कम पानी में अच्छी तरह उत्पादन देने वाली फसलों एवं किस्मों का चयन किया जाना चाहिए। इससे उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ किसानों के उत्पादन जोखिम को भी कम किया जा सकता है। किसानों को खेत में जैव विविधता बढ़ाने तथा पशुपालन को कृषि से जोड़कर प्राकृतिक खेती की एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने की भी सलाह दी गई।
उप परियोजना संचालक आत्मा श्रीमती प्राची कौतू ने किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह देते हुए बताया कि अल्प वर्षा की स्थिति में खेत में नमी संरक्षण प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने खेत में फसल अवशेषों का उपयोग मल्चिंग के रूप में करने, मिट्टी को अनावश्यक रूप से खुला न छोड़ने तथा जैविक आदानों के उपयोग से मिट्टी की संरचना एवं जलधारण क्षमता में सुधार करने पर जोर दिया। उन्होंने किसानों को बीजामृत से बीज उपचार, जीवामृत एवं घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक कृषि आदानों के उपयोग की जानकारी दी। साथ ही खेत में उपलब्ध संसाधनों से प्राकृतिक आदान तैयार कर लागत कम करने तथा मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाने की सलाह दी।
कृषि अभियांत्रिकी विभाग की सहायक संचालक सुश्री अश्विनी सिंह ने बताया कि जिले में पर्याप्त मात्रा में सुपर सीडर उपलब्ध है। किसान सुपर सीडर का उपयोग कर जीरो टिलेज पद्धति से चना, सरसों आदि की बोनी समय पर कर सकते हैं। इससे किसानों की लागत भी कम होगी एवं मक्के की नरवाई को जमीन में मिलाकर मृदा की उर्वरकता बढ़ेगी। कृषक वैज्ञानिक परिचर्चा में उन्नतशील किसान एवं महिला कृषकों के साथ-साथ कृषि एवं आत्मा योजना का मैदानी अमला उपस्थित था।